महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1493, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रतः । पुराणं शाश्वतं दिव्यं दुष्प्राप्यमकृतात्मभिः ॥ १२ ॥ **धर्मव्याधने कहा—**विप्रवर! आप देवताओंके समान हैं; क्योंकि आपने उस धर्ममें मन लगाया है, जो पुरातन, सनातन, दिव्य तथा मनको न जीतनेवाले पुरुषोंके लिये दुर्लभ है ॥ १२ ॥
मातापित्रोः सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम । अतन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् । अतः परमहं धर्मं नान्यं पश्यामि कंचन ॥ १३ ॥ द्विजश्रेष्ठ! आप माता-पिताके पास जाकर आलस्यरहित हो शीघ्र ही उनकी सेवामें लग जाइये। मैं इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं देखता ॥ १३ ॥
ब्राह्मण उवाच
इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सङ्गतं त्वया । ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ॥ १४ ॥ **ब्राह्मण बोला—**नरश्रेष्ठ! मेरा बड़ा भाग्य था, जो यहाँ आया और सौभाग्यसे ही मुझे आपका संग प्राप्त हो गया। संसारमें आप-जैसे धर्मका मार्ग दिखानेवाले मनुष्य दुर्लभ हैं ॥ १४ ॥
एको नरसहस्रेषु धर्मविद् विद्यते न वा । प्रीतोऽस्मि तव सत्येन भद्रं ते पुरुषर्षभ ॥ १५ ॥ हजारों मनुष्योंमेंसे कोई एक भी धर्मके तत्त्वको जाननेवाला है या नहीं—यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। पुरुषर्षभ! आपका कल्याण हो। आज मैं आपके सत्यके कारण आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १५ ॥
पतमानोऽद्य नरके भवतास्मि समुद्धृतः । भवितव्यमथैवं च यद् दृष्टोऽसि मयानघ ॥ १६ ॥ अनघ! मैं नरकमें गिर रहा था। आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इस प्रकार जब मुझे आपका दर्शन मिल गया, तब निश्चय ही आपके उपदेशके अनुसार भविष्यमें सब कुछ होगा ॥ १६ ॥
राजा ययातिर्दौहित्रैः पतितस्तारितो यथा । सद्भिः पुरुषशार्दूल तथाहं भवता द्विजः ॥ १७ ॥ राजा ययाति स्वर्गसे गिर गये थे; परंतु उनके उत्तम स्वभाववाले दौहित्रों (पुत्रीके पुत्रों)-ने पुनः उनका उद्धार कर दिया—वे पूर्ववत् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हो गये। पुरुषसिंह! इसी प्रकार आपने भी आज मुझ ब्राह्मणको नरकमें गिरनेसे बचाया है ॥ १७ ॥
मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात् तव ।