महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1500, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते। परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥ २१ ॥ त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः। असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ २२ ॥ केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दुःख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं। मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है ॥ २१-२२ ॥
असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्। न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २३ ॥ असंतोषका अन्त नहीं है, अतः संतोष ही परम सुख है। जिन्होंने ज्ञानमार्गको पार करके परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते हैं ॥
न विषादे मनः कार्य विषादो विषमुत्तमम्। मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ २४ ॥ मनको विषादकी ओर न जाने दे। विषाद उग्र विष है। वह क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति विवेकहीन अज्ञानी मनुष्यको मार डालता है ॥ २४ ॥
यं विषादोऽभिभवति विक्रमे समुपस्थिते। तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥ २५ ॥ पराक्रमका अवसर उपस्थित होनेपर जिसे विषाद घेर लेता है, उस तेजोहीन पुरुषका कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता ॥ २५ ॥
अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम्। न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥ २६ ॥ किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है। केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता ॥ २६ ॥
अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे। अशोचन्नारभेतैवं मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥ २७ ॥ अतः दुःखसे छूटनेके उपायको अवश्य देखे। शोक और विषादमें न पड़कर आवश्यक कार्य आरम्भ कर दे। इस प्रकार प्रयत्न करनेसे मनुष्य निश्चय ही दुःखसे छूट जाता है और फिर किसी संकट या व्यसनमें नहीं फँसता ॥ २७ ॥
भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः। न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २८ ॥ संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा सोचकर जो बुद्धिसे पार होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं वे ज्ञानी महापुरुष परमात्माका साक्षात्कार करते हुए कभी शोकमें नहीं पड़ते ॥ २८ ॥