महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1501, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंन शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम् । एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम ॥ २९ ॥ विद्वन्! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ। अतः कभी शोकमग्न नहीं होता। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! उपर्युक्त विचारोंका मनन करते रहनेसे मुझे कभी दुःख या अनुत्साह नहीं होता ॥ २९ ॥
ब्राह्मण उवाच
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव । नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ॥ ३० ॥ **ब्राह्मण बोला—**धर्मव्याध! आप ज्ञानी और बुद्धिमान् हैं। आपकी बुद्धि विशाल है। आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं और ज्ञानानन्दसे तृप्त रहते हैं। अतः मैं आपके लिये शोक नहीं करता ॥ ३० ॥
आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु । अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ॥ ३१ ॥ अब मैं जानेके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका कल्याण हो और धर्म सदा आपकी रक्षा करे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! आप धर्माचरणमें कभी प्रमाद न करें ॥ ३१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह । प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥ ३२ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! कौशिक ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मव्याधने हाथ जोड़कर कहा—'बहुत अच्छा! अब आप अपने घरको पधारें।' तदनन्तर विप्रवर कौशिक धर्मव्याधकी परिक्रमा करके वहाँसे चल दिया ॥ ३२ ॥
स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा । मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसितः ॥ ३३ ॥ घर जाकर उस ब्राह्मणने अपने माता-पिताकी सब प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा की और उन बूढ़े माता-पिताने प्रसन्न होकर उसकी यथायोग्य प्रशंसा की ॥ ३३ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर । पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ॥ ३४ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तात युधिष्ठिर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने ये सब बातें कह सुनायीं ॥
पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम । मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥ ३५ ॥