भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1505

लोकों तथा स्थावर-जंगम प्राणियोंमें आपकी प्रसिद्धि है ॥ १२-१३ ॥ त्वमग्निः प्रथमं सृष्टो ब्रह्मणा तिमिरापहः । स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमोनुद ॥ १४ ॥ 'ब्रह्माजीने आपको ही अन्धकारनाशक प्रथम अग्निके रूपमें उत्पन्न किया है। तिमिरपुञ्जको दूर भगानेवाले देवता! आप शीघ्र ही अपना स्थान ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

अग्निरुवाच

नष्टकीर्तिरहं लोके भवान् जातो हुताशनः । भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ॥ १५ ॥ **अग्निदेव बोले—**मुने! संसारमें मेरी कीर्ति नष्ट हो गयी है। अब आप ही अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हैं। आपको ही लोग अग्नि समझेंगे, आपके सामने मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा ॥ १५ ॥

निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव । भविष्यामि द्वितीयोऽहं प्राजापत्यक एव च ॥ १६ ॥ मैं अपना अग्नित्व आपमें ही रख देता हूँ, आप ही प्रथम अग्निके पदपर प्रतिष्ठित होइये। मैं द्वितीय प्राजापत्य नामक अग्नि होऊँगा ॥ १६ ॥

अंगिरा उवाच

कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरपहः । मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ॥ १७ ॥ **अङ्गिराने कहा—**अग्निदेव! आप प्रजाको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुण्यकर्म (देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेका कार्य) सम्पन्न कीजिये और स्वयं ही अन्धकारनिवारक अग्निपदपर प्रतिष्ठित होइये; साथ ही मुझे अपना पहला पुत्र स्वीकार कर लीजिये ॥ १७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत् । राजन् बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ॥ १८ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! अंगिराका यह वचन सुनकर अग्निदेवने वैसा ही किया। उन्हें अपना प्रथम पुत्र मान लिया। फिर अंगिराके भी बृहस्पति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १८ ॥

ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् । उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ॥ १९ ॥ भरतनन्दन! अंगिराको अग्निदेवका प्रथम पुत्र जानकर सब देवता उनके पास आये और इसका कारण पूछने लगे ॥ १९ ॥