महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1518, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अग्निस্বরূপ तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
गुरुभिर्नियमैर्युक्तो भरतो नाम पावकः ।
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रयच्छति ।
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति' भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं ॥ १ ॥
अग्निर्यश्च शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः ।
दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत् सततं शिवः ॥ २ ॥
'शिव' नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव' कहते हैं ॥ २ ॥
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा सम्प्रवृद्धं तपो महत् ।
उद्धर्तुकामो मतिमान् पुत्रो जज्ञे पुरंदरः ॥ ३ ॥
तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान् हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान् इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए ॥ ३ ॥^३.
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निधूतस्य लक्ष्यते ।
अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत् ॥ ४ ॥
उन्हीं पांचजन्यसे 'ऊष्मा' नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो 'मनु' नामक अग्निस্বরূপ पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य' यज्ञ सम्पन्न कराया था ॥ ४ ॥
शम्भुमग्निमथ प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ॥ ५ ॥
वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण 'शम्भु' तथा 'आवसथ्य' नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान् तेजः पुञ्जसे सम्पन्न बताते हैं ॥ ५ ॥
ऊर्जस्करान् हव्यवाहान् सुवर्णसदृशप्रभान् ।
ततस्तपो ह्यजनयत् पञ्च यज्ञसुतानिह ॥ ६ ॥