महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान्, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं ।। ६ ।।
प्रशान्तेऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पतिः ।
असुरान् जनयन् घोरान् मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ।। ७ ।।
महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस্বরূপ हो जाते हैं।³ भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है) ।। ७ ।।
तपसश्च मनुं पुत्रं भानुं चाप्यङ्गिराः सृजत् ।
बृहद्भानुं तु तं प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ।। ८ ।।
तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मण भानुको ही ‘बृहद्भानु’ कहते हैं ।। ८ ।।
भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्भासा तु सूर्यजा ।
असृजेतां तु षट् पुत्रान् शृणू तासां प्रजाविधिम् ।। ९ ।।
भानुकी दो पत्नियाँ हुईं—सुप्रजा और बृहद्भासा। इनमें बृहद्भासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो ।। ९ ।।
दुर्बलानां तु भूतानामसून यः सम्प्रयच्छति ।
तमग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम् ।। १० ।।
जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें ‘बलद’ नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं ।। १० ।।
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः ।
अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुतः सुतः ।। ११ ।।
जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर ‘क्रोध’ बनकर प्रकट होते हैं, वे ‘मन्युमान्’ नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं ।। ११ ।।
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते ।
विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोऽङ्गिराः ।। १२ ।।
यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम ‘विष्णु’ है। वे ‘अंगिरा’ गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम ‘धृतिमान्’ अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं) ।। १२ ।।³
इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् ।