भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1520

अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः ॥ १३ ॥
इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अन्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य-अर्पणका विधान है, वे 'आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ॥
चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रहः ।
चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वयः स्तुभः ॥ १४ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्भवस्थान हैं, उनका नाम 'अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं—से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ' नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छः पुत्र हैं ॥ १४ ॥
निशा त्वजनयत् कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा ।
मनोरेवाभवद् भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ॥ १५ ॥
मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम 'रोहिणी' तथा) पुत्रोंके नाम थे—अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस্বরূপ पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—वैश्वानर, विश्वपति, सन्निहित, कपिल और अग्रणी) ॥ १५ ॥
पूज्यते हविषाग्र्येण चातुर्मास्येषु पावकः ।
पर्जन्यसहितः श्रीमानग्निवैश्वानरस्तु सः ॥ १६ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान् वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं ॥ १६ ॥
अस्य लोकस्य सर्वस्य यः प्रभुः परिपठ्यते ।
सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनोः सुतः ॥ १७ ॥
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमस्तु सः ।
जो वेदोंमें 'सम्पूर्ण जगत्के पति' कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत् (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं ॥ १७ १/२ ॥
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता ॥ १८ ॥
कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः ।
मनुकी कन्या भी 'स्विष्टकृत्' ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें 'मनु' ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ॥ १८ १/२ ॥
प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् ।
तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधनः ॥ १९ ॥