भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1521

जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित' अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है ।। १९ ।। शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् । अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ।। २० ।। कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतयः सदा । अग्निः स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तकः ।। २१ ।। जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण-पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगत्के कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अग्नि हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं) ।। २०-२१ ।। अग्रं यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ।। २२ ।। मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोंमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं ।। २२ ।। इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि । अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ।। २३ ।। मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त (समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं ।। २३ ।। संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद् वायुनाग्नयः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचयेऽग्नये ।। २४ ।। यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें* संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये ।। २४ ।। दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेऽग्नये ।। २५ ।। जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा 'वीति' नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये ।। २५ ।। यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये ।। २६ ।।