महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1522, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २६ ॥ अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमतेऽग्नये ॥ २७ ॥ यदि अग्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये ॥ २७ ॥ मृतः श्रूयेत यो जीवः परेयुः पशवो यदा । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या सुरभिमतेऽग्नये ॥ २८ ॥ यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये ॥ २८ ॥ आर्तो न जुहुयादग्निं त्रिरात्रं यस्तु ब्राह्मणः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अग्निहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा ‘उत्तर’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २९ ॥ दर्शं च पौर्णमासं च यस्य तिष्ठेत् प्रतिष्ठितम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नये ॥ ३० ॥ जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे ‘पथिकृत’ नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ॥ सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नये ॥ ३१ ॥ जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा ‘अग्निमान्’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
१. तप अर्थात् पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है। २. श्रुति भी कहती है—‘आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति।’