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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित' अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है ।। १९ ।। शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् । अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ।। २० ।। कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतयः सदा । अग्निः स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तकः ।। २१ ।। जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण-पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगत्के कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अग्नि हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं) ।। २०-२१ ।। अग्रं यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ।। २२ ।। मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोंमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं ।। २२ ।। इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि । अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ।। २३ ।। मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त (समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं ।। २३ ।। संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद् वायुनाग्नयः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचयेऽग्नये ।। २४ ।। यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें* संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये ।। २४ ।। दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेऽग्नये ।। २५ ।। जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा 'वीति' नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये ।। २५ ।। यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये ।। २६ ।।

यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २६ ॥ अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमतेऽग्नये ॥ २७ ॥ यदि अग्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये ॥ २७ ॥ मृतः श्रूयेत यो जीवः परेयुः पशवो यदा । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या सुरभिमतेऽग्नये ॥ २८ ॥ यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये ॥ २८ ॥ आर्तो न जुहुयादग्निं त्रिरात्रं यस्तु ब्राह्मणः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अग्निहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा ‘उत्तर’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २९ ॥ दर्शं च पौर्णमासं च यस्य तिष्ठेत् प्रतिष्ठितम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नये ॥ ३० ॥ जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे ‘पथिकृत’ नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ॥ सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नये ॥ ३१ ॥ जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा ‘अग्निमान्’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥


१. तप अर्थात् पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है। २. श्रुति भी कहती है—‘आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति।’

३. बलद, मन्युमान् तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं। इसी प्रकार 'आग्रयण' 'अग्रह' और 'स्तुभ'—ये तीन अग्नि बृहद्भासाकी संतान हैं।

  • मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है।

२२२-

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनःउनका प्राकट्य

मार्कण्डेय उवाच

आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया ।
भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत् पावकं परम् ।। १ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह' नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने 'अद्भुत'* नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया ।। १ ।।

भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् ।
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु ।। २ ।।
ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि 'अद्भुत' नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं ।। २ ।।

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः ।
भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावकः ।। ३ ।।
‘वे ही इस जगत्के सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं ।। ३ ।।

अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते ।
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ।। ४ ।।
‘जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्को पवित्र करनेवाले हैं ।। ४ ।।

अपां गर्भो महाभागः सत्त्वभुग् यो महाद्भुतः ।
भूपतिर्भुवभर्ता च महतः पतिरुच्यते ।। ५ ।।
‘जो ‘आप’ नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान् अग्नि बुद्धितत्त्वके अधिपति बताये जाते हैं’ ।। ५ ।।

दहन् मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतोऽभवत् ।
अग्निष्टोमे च नियतः क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु ।। ६ ।।
‘उन्हीं ‘अद्भुत’ या गृहपतिके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘भरत’ है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है,

इसलिये उन्हें 'नियत' भी कहते हैं। नियतका संकल्प उत्तम है ।। ६ ।। स वह्निः प्रथमो नित्यं देवैरन्विष्यते प्रभुः ।
आयान्तं नियतं दृष्ट्वा प्रविवेशार्णवं भयात् ।। ७ ।।
'प्रथम अग्नि 'सह' बड़े प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उनको ढूँढ़ रहे थे। उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख (उससे छू जानेके) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये ।। ७ ।।
देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् ।
दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमब्रवीत् ।। ८ ।।
तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अंगिरा)-को देखकर अग्निने उनसे कहा— ।। ८ ।।
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः ।
अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमितत् कुरुष्व मे ।। ९ ।।
वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो' ।। ९ ।।
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् ।
मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत् ।
भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम् ।। १० ।।
इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये। किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया। इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा—'तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे' ।।
अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहोऽब्रवीद् वचः ।। ११ ।।
अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः ।
नैच्छद् वोढुं हविः सोढुं शरीरं चापि सोऽत्यजत् ।। १२ ।।
तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया ।। ११-१२ ।।
स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा ।
भूमिं स्पृष्ट्वासृजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि ।। १३ ।।
उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये। भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक्-पृथक् बहुत-से धातुओंकी सृष्टि की ।। १३ ।।
पूयात् स गन्धं तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च ।
श्लेष्मणः स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा ।। १४ ।।

‘सह’ नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हड्डियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १४ ॥ यकृत् कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभुः प्रजाः । नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम् ॥ १५ ॥ और उनका यकृत् (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा—इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाड़ियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं ॥ १५ ॥ शरीराद् विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन् नृप । एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥ १६ ॥ राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥ भृग्वङ्गिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वल तेजस्वी तपसाऽऽप्यायितः शिखी ॥ १७ ॥ जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे ॥ १७ ॥ दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् । तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् । अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥ १८ ॥ महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा—अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ॥ १८ ॥ अथर्वा त्वसृजल्लोकानात्मनाऽऽलोक्य पावकम् । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ॥ १९ ॥ अथर्वाने सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रको मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की ॥ १९ ॥ एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा । आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥ २० ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ॥ २० ॥ एवं त्वजनयद् धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् । विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥ २१ ॥

उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया ॥ २१ ॥

सिन्धुनदं पञ्चनदं देविकाथ सरस्वती ।
गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्वया ॥ २२ ॥
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा ।
ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥ २३ ॥
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा ।
वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत ॥ २४ ॥
भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा ।
तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥ २५ ॥
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ।

सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र—ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं ॥ २२—२५ १/२ ॥

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः ॥ २६ ॥
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ।
अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः ॥ २७ ॥

अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके ‘विभूरसि’ नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ २६-२७ ॥

अत्रिः पुत्रान् स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥ २८ ॥
तस्य तद्ब्रह्मणः कायान्निर्हरन्ति हुताशनाः ।

अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८ १/२ ॥

एवमेते महात्मानः कीर्तितास्तेऽग्नयो मया ॥ २९ ॥
अप्रमेया यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः ।

राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान् महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया ॥ २९ १/२ ॥

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् ॥ ३० ॥

तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येषु हुताशनः ।
वेदोंमें 'अद्भुत' नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है ।। ३० १/२ ।।
एक एवैष भगवान् विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ।। ३१ ।।
बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा ।
ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है ।। ३१ १/२ ।।
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया ।
योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ।। ३२ ।।
इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वारा पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि
आङ्गिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक अग्निप्रादुर्भावसम्बन्धी दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।


* 'सहसः पुत्रोऽद्भुतः' इति मन्त्रवर्णः।

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।

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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार

(वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयं तपस्विनम् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह धर्मयुक्त कल्याणमयी कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उन तपस्वी मुनि मार्कण्डेयजीसे पूछा ॥

युधिष्ठिर उवाच

कुमारस्तु यथा जातो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् ।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलमतीव मे ॥)
**युधिष्ठिर बोले—**मुने! कुमार (स्कन्द)-का जन्म कैसे हुआ? वे अग्निके पुत्र किस प्रकार हुए? भगवान् शिवसे उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई? तथा वे गंगा और छहों कृत्तिकाओंके गर्भसे कैसे प्रकट हुए? मैं यह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥

मार्कण्डेय उवाच

अग्नीनां विविधा वंशाः कीर्तितास्ते मयानघ ।
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्तिकेयस्य धीमतः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजीने कहा—**निष्पाप युधिष्ठिर! मैंने तुमसे अग्नियोंके विविध वंशोंका वर्णन किया। अब तुम परम बुद्धिमान् कार्तिकेयके जन्मका वृत्तान्त सुनो ॥ १ ॥

अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् ।
जातं ब्रह्मर्षिभार्याभिर्ब्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ॥ २ ॥
अद्भुत अग्निके अद्भुत पुत्र कार्तिकेयके बल और तेज असीम हैं। उनका जन्म ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके गर्भसे हुआ है। वे अपने उत्तम यशको बढ़ानेवाले तथा ब्राह्मणभक्त हैं। मैं उनके जन्मका वृत्तान्त बता रहा हूँ, सुनो ॥ २ ॥

देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम् ।
तत्राजयन् सदा देवान् दानवा घोररूपिणः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, देवता और असुर युद्धके लिये उद्यत हो एक-दूसरेको अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाया करते थे। उस संघर्षके समय भयंकर रूपवाले दानव सदा ही देवताओंपर विजय पाते थे ॥ ३ ॥

वध्यमानं बल दृष्ट्वा बहुशस्तैः पुरंदरः । स सैन्यनायकार्थाय चिन्तामाप भृशं तदा ॥ ४ ॥ जब इन्द्रने देखा कि दानव बार-बार देवताओंकी सेनाका वध कर रहे हैं, तब उन्हें एक सुयोग्य सेनापतिकी आवश्यकता हुई। इसके लिये वे बहुत चिन्तित हुए ॥ ४ ॥

देवसेनां दानवैर्हि भरनां दृष्ट्वा महाबलः । पालयेद् वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेयः पुरुषो मया ॥ ५ ॥ उन्होंने सोचा 'मुझे ऐसे पुरुषका पता लगाना चाहिये जो महान् बलवान् हो और अपने पराक्रमका आश्रय ले देवताओंकी उस सेनाका, जिनका दानव नाश कर देते हैं, संरक्षण करे' ॥ ५ ॥

स शैलं मानसं गत्वा ध्यायन्नर्थमिदं भृशम् । शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिया तदा ॥ ६ ॥ इसी बातका बार-बार विचार करते हुए इन्द्र मानसपर्वतपर गये। वहाँ उन्हें एक स्त्रीके मुखसे निकला हुआ भयंकर आर्तनाद सुनायी दिया ॥ ६ ॥

अभिधावतु मां कश्चित् पुरुषस्त्रातु चैव ह । पतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे ॥ ७ ॥ वह कह रही थी 'कोई वीर पुरुष दौड़कर आये और मेरी रक्षा करे। वह मेरे लिये पति प्रदान करे या स्वयं ही मेरा पति हो जाय' ॥ ७ ॥

पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव । एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः ॥ ८ ॥ यह सुनकर इन्द्रने उससे कहा—‘भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं है।’ ऐसा कहकर जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली, तब केशी दानव सामने खड़ा दिखायी दिया ॥ ८ ॥

किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् । हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥ उसने मस्तकपर किरीट धारण कर रखा था। उसके हाथमें गदा थी और वह एक कन्याका हाथ पकड़े विविध धातुओंसे विभूषित पर्वत-सा जान पड़ता था। यह देख इन्द्रने उससे कहा— ॥ ९ ॥

अनार्यकर्मन् कस्मात् त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि । वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥ १० ॥ ‘रे नीच कर्म करनेवाले दानव! तू कैसे इस कन्याका अपहरण करना चाहता है? समझ ले, मैं वज्रधारी इन्द्र हूँ। अब इस अबलाको सताना छोड़ दे ॥ १० ॥

केश्युवाच

विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया । क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥ ११ ॥ केशी बोला—इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे। मैंने इसका वरण कर लिया है। पाकशासन! ऐसा करनेपर ही तू जीता-जागता अपनी अमरावती पुरीको लौट सकता है ॥ ११ ॥

एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै । तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥ १२ ॥ ऐसा कहकर केशीने इन्द्रका वध करनेके लिये अपनी गदा चलायी। परंतु इन्द्रने अपने वज्रद्वारा उस आती हुई गदाको बीचसे ही काट डाला ॥ १२ ॥

अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् । तदा पतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः ॥ १३ ॥ बिभेद राजन् वज्रेण भुवि तन्निपपात ह । पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः ॥ १४ ॥ तब केशीने कुपित होकर इन्द्रपर पर्वतकी एक चट्टान फेंकी। राजन्! उस शैलशिखरको अपने ऊपर गिरता देख इन्द्रने वज्रसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और वह चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय गिरते हुए उस शिलाखण्डने केशीको ही भारी चोट पहुँचायी ॥

हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडितः । अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत् ।

कासि कस्यासि किञ्चेह कुरुषे त्वं शुभानने ॥ १५ ॥
उस आघातसे अत्यन्त पीडित हो वह दानव उस परम सौभाग्यशालिनी कन्याको छोड़कर भाग गया। उस असुरके भाग जानेपर इन्द्रने उस कन्यासे पूछा—'सुमुखि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो?' ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ केशिपराभवे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानप्रकरणमें स्कन्दकी उत्पत्तिके विषयमें केशिपराभवविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १७ १/३ श्लोक हैं)

२२४-

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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन

कन्योवाच

अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता ।
भगिनी दैत्यसेना मे सा पूर्वं केशिना हृता ॥ १ ॥
**कन्या बोली—**देवेन्द्र! मैं प्रजापतिकी पुत्री हूँ। मेरा नाम देवसेना है। मेरी बहिनका नाम दैत्यसेना है, जिसे इस केशीने पहले ही हर लिया था ॥ १ ॥

सदैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम् ।
आगच्छावेह रत्यर्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥ २ ॥
हम दोनों बहिनें अपनी सखियोंके साथ प्रजापतिकी आज्ञा लेकर सदा क्रीडाविहारके लिये इस मानस पर्वतपर आया करती थीं ॥ २ ॥

नित्यं चावां प्रार्थयते हर्तुं केशी महासुरः ।
इच्छत्येनं दैत्यसेना न चाहं पाकशासन ॥ ३ ॥
पाकशासन! महान् असुर केशी प्रतिदिन यहाँ आकर हम दोनोंको हर ले जानेके लिये फुसलाया करता था। दैत्यसेना इसे चाहती थी, परंतु मेरा इसपर प्रेम नहीं था ।।

सा हृतानेन भगवन् मुक्ताहं त्वद्वलेन तु ।
त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम् ॥ ४ ॥
अतः दैत्यसेनाको तो यह हर ले गया, परंतु मैं आपके पराक्रमसे बच गयी। भगवन्! देवेन्द्र! अब मैं आपके आदेशके अनुसार किसी दुर्जय वीरको अपना पति बनाना चाहती हूँ ॥ ४ ॥

इन्द्र उवाच

मम मातृष्वसेयी त्वं माता दाक्षायणी मम ।
आख्यातुं त्वहमिच्छामि स्वयमात्मबलं त्वया ॥ ५ ॥
**इन्द्र बोले—**शुभे! तुम मेरी मौसेरी बहिन हो। मेरी माता भी दक्षकी ही पुत्री हैं। मेरी इच्छा है कि तुम स्वयं ही अपने बलका परिचय दो ॥ ५ ॥

कन्योवाच

अबलाहं महाबाहो पतिस्तु बलवान् मम ।
वरदानात् पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ॥ ६ ॥

**कन्या बोली—**महाबाहो! मैं तो अबला हूँ। पिताजीके वरदानसे मेरे भावी पति बलवान् तथा देवदानव-वन्दित होंगे ।। ६ ।।

इन्द्र उवाच

कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ।। ७ ।।
**इन्द्रने पूछा—**देवि! तुम्हारे पतिका बल कैसा होगा? अनिन्दिते! यह बात मैं तुम्हारे ही मुँहसे सुनना चाहता हूँ ।। ७ ।।

कन्योवाच

देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ।। ८ ।।
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति ।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ।। ९ ।।
**कन्या बोली—**देवराज! जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस तथा दुष्ट दैत्योंको जीतनेवाला हो; जिसका पराक्रम महान् और बल असाधारण हो तथा जो तुम्हारे साथ रहकर समस्त प्राणियोंपर विजय प्राप्त कर सके, वह ब्राह्मणहितैषी तथा अपने यशकी वृद्धि करनेवाला वीर पुरुष मेरा पति होगा ।। ८-९ ।।

मार्कण्डेय उवाच

इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम् ।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ।। १० ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! देवसेनाकी बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो सोचने लगे 'इस देवीको जैसा यह बता रही है, वैसा पति मिलना सम्भव नहीं जान पड़ता' ।। १० ।।

अथापश्यत् स उदये भास्करं भास्करद्युतिः ।
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ।। ११ ।।
तदनन्तर सूर्यके समान तेजस्वी इन्द्रने देखा, सूर्य उदयाचलपर आ गये हैं। महाभाग चन्द्रमा भी सूर्यमें ही प्रवेश कर रहे हैं ।। ११ ।।

अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहूर्ते रौद्र एव तु ।
देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ।। १२ ।।
अमावस्या आरम्भ हो गयी थी। उस रौद्र (भयंकर) मुहूर्तमें ही उदयगिरिके शिखरपर उन्हें देवासुर-संग्रामका लक्षण दिखायी दिया ।। १२ ।।

लोहितैश्च धनैर्युक्तां पूर्वा संध्यां शतक्रतुः ।

अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरुणालयम् ॥ १३ ॥
ऐश्वर्यशाली इन्द्रने देखा, पूर्वसंध्या (प्रभात)-का समय है, प्राचीके आकाशमें लाल रंगके घने बादल घिर आये हैं और समुद्रका जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ १३ ॥
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः ।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥ १४ ॥
भृगु तथा अंगिरा गोत्रके ऋषियोंद्वारा पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन किये हुए हविष्यको ग्रहण करके अग्निदेव भी सूर्यमें ही प्रवेश करते हैं ॥ १४ ॥
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम् ।
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥ १५ ॥
उस समय भगवान् सूर्यके निकट चौबीसवाँ पर्व उपस्थित था; अर्थात् पहले जिस अमावस्यापर्वमें देवासुर-संग्राम हुआ था; उससे पूरे एक वर्षके बाद पुनः वैसा अवसर आया था। धर्मकी अर्थात् होम और संध्याकी वेलामें वह रौद्र मुहूर्त उपस्थित था और चन्द्रमा सूर्यकी राशिमें स्थित हो गये थे ॥ १५ ॥
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च ।
समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यकी एकता (एक राशिपर स्थिति) तथा रौद्र मुहूर्तका संयोग देखकर इन्द्र मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन करने लगे— ॥ १६ ॥
सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् ।
एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद् युद्धं तु शंसति ॥ १७ ॥
'अहो! इस समय चन्द्रमा और सूर्यपर यह भयंकर घेरा दिखायी दे रहा है। इससे सूचित होता है कि रात बीतते-बीतते भारी युद्ध छिड़ जायगा ॥ १७ ॥
सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम् ।
शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥ १८ ॥
'यह सिन्धु नदी भी उलटी धारामें बहकर रक्तके स्रोत बहा रही है। सियारिन मुँहसे आग उगलती हुई-सी सूर्यकी ओर देखकर रोती है ॥ १८ ॥
एष रौद्रश्च सङ्घातो महान् युक्तश्च तेजसा ।
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥ १९ ॥
'अनेक योगोंका यह भयंकर तथा महान् संघात (सम्मेलन) तेजसे आलोकित हो रहा है। अग्नि और सूर्यके साथ चन्द्रमाका यह अद्भुत समागम दृष्टिगोचर होता है ॥
जनयेद् यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ।
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता ॥ २० ॥
'जान पड़ता है, इस समय चन्द्रमा जिस पुत्रको जन्म देंगे, वही इस देवीका पति होगा अथवा अग्नि भी इन सभी अभीष्ट गुणोंसे युक्त हैं। वे भी देवकोटिमें ही हैं ॥

एष चेज्जनयेद् गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् । एवं संचिन्त्य भगवान् ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥ २१ ॥ गृहीत्वा देवसेनां तामवदत् स पितामहम् । उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधुशूरं पतिं दिश ॥ २२ ॥ ‘अतः ये यदि किसी बालकको उत्पन्न करें तो वही इस देवीका पति होगा।’ ऐसा सोच-विचारकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र उस समय उस देवसेनाको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले—‘भगवन्! आप इस देवीके लिये कोई अच्छे स्वभावका शूरवीर पति प्रदान कीजिये’ ॥ २१-२२ ॥

ब्रह्मोवाच

मयैतच्चिन्तितं कार्यं त्वया दानवसूदन । तथा स भविता गर्भो बलवानुरुविक्रमः ॥ २३ ॥ ब्रह्माजीने कहा—दानवसूदन! इस विषयमें तुमने जो विचार किया है वही मैंने भी सोचा है। वैसा होनेपर ही एक महान् पराक्रमी बलवान् वीरका प्रादुर्भाव होगा ॥ २३ ॥ स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो । अस्या देव्याःपतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥ २४ ॥ शतक्रतो! वही तुम्हारे साथ रहकर देवसेनाका पराक्रमी सेनापति होगा और वही इस देवीका भी पति होगा ॥ २४ ॥

एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया । तत्राभ्यगच्छद् देवेन्द्रो यत्र देवर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥ वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाबलाः । यह सुनकर देवराज इन्द्र ब्रह्माजीको नमस्कार करके उस कन्याको साथ ले जहाँ महान् शक्तिशाली वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं देवर्षि थे, वहाँ उनके आश्रमपर आये ॥ २५ १/२ ॥ भागार्थं तपसो धातुं तेषां सोमं तथाध्वरे ॥ २६ ॥ पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः । उन दिनों वे महर्षिगण जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें भाग लेनेके लिये तथा सोमपान करनेके लिये इन्द्र आदि सभी देवता वहाँ पधारे थे। उन सबके मनमें सोमपान की इच्छा थी ॥ २६ १/२ ॥ इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥ २७ ॥ जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम् । उन महात्मा ऋषियोंने प्रज्वलित अग्निमें शास्त्रीय विधिसे इष्टिका सम्पादन करके सम्पूर्ण देवताओंके लिये हविष्यकी आहुति दी ॥ २७ १/२ ॥ समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥ २८ ॥ विनिःसृत्य ययौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत् प्रभुः । आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥ २९ ॥ स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः । ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥ ३० ॥ भरतश्रेष्ठ! मन्त्रोंद्वारा आवाहन होनेपर वे अद्भुत नामक अग्नि सूर्यमण्डलसे निकलकर मौनभावसे वहाँ आये और ब्रह्मर्षियोंद्वारा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् हवन किये हुए भाँति-भाँतिके हवनीय पदार्थोंको उन महर्षियोंसे प्राप्त करके उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंकी सेवामें अर्पित किया ॥ निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत् स पत्नीस्तेषां महात्मनाम् । स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्वपन्तीश्च तथा सुखम् ॥ ३१ ॥ देवताओंको हविष्य पहुँचाकर जब अग्निदेव वहाँसे जाने लगे, तब उनकी दृष्टि उन महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंपर पड़ी। उनमेंसे कुछ तो अपने आसनोंपर बैठी थीं और कुछ सुखपूर्वक सो रही थीं' ॥ ३१ ॥ रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः । हुताशणार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥ ३२ ॥ उनकी अंगकान्ति सुवर्णमयी वेदीके समान गौर थी, वे चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल थीं, अग्निकी लपटोंके समान प्रभा बिखेर रही थीं और तारिकाओंके समान अद्भुत सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३२ ॥

स तत्र तेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः । पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥ ३३ ॥ इस प्रकार वहाँ (आसक्तियुक्त) मनसे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंको देखकर अग्निदेवकी सारी इन्द्रियाँ क्षोभसे चञ्चल हो उठीं। वे सर्वथा कामके अधीन हो गये ॥ ३३ ॥

भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम् । साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामाः कामयाम्यहम् ॥ ३४ ॥ फिर उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि 'मेरा यह कार्य कदापि उचित नहीं है। मेरे मनमें विचार आ गया है। इन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियाँ पतिव्रता हैं। ये मुझे बिलकुल नहीं चाहतीं, तो भी मैं इनकी कामना करता हूँ ॥ ३४ ॥

नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः । गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥ ३५ ॥ 'मैं अकारण न तो इन्हें देख सकता हूँ और न इनका स्पर्श ही कर सकता हूँ। ऐसी दशामें यदि मैं गार्हपत्य अग्निमें प्रविष्ट हो जाऊँ तो बार-बार इनके दर्शनका अवसर पा सकता हूँ' ॥ ३५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः । पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥ ३६ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा निश्चय करके अग्निदेवने गार्हपत्य अग्निका आश्रय लिया और अपनी लपटोंसे स्वर्गकी-सी कान्तिवाली उन ऋषि-पत्नियोंका स्पर्श तथा दर्शन-सा करते हुए वे बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥

निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः । मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥ ३७ ॥ इस प्रकार बहुत देरतक वहाँ टिके रहकर अग्निदेव कामके वशमें हो गये। वे अपना हृदय उन सुन्दरियोंपर निछावर करके उनसे मिलनेकी कामना कर रहे थे ॥

कामसंतप्तहृदयो देहत्यागविनिश्चितः । अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥ ३८ ॥ उनका हृदय कामाग्निसे संतप्त हो रहा था। वे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके न मिलनेसे अपने शरीरको त्याग देनेका निश्चय कर चुके थे। अतः वनमें चले गये ॥

स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामयत् तदा । सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भाविनी ॥ ३९ ॥ प्रजापति दक्षकी पुत्री स्वाहा पहलेसे ही अग्निदेवको अपना पति बनाना चाहती थी और इसके लिये बहुत दिनोंसे वह अग्निका छिद्र ढूँढ़ रही थी ॥ ३९ ॥

अप्रमत्तस्य देवस्य न च पश्यत्यनिन्दिता ।
सा तं ज्ञात्वा यथावत् तु वह्निं वनमुपागतम् ॥ ४० ॥
तत्त्वतः कामसंतप्तं चिन्तयामास भाविनी ।
परंतु अग्निदेवके सदा सावधान रहनेके कारण साध्वी स्वाहा उनका कोई दोष नहीं देख पाती थी। जब उसे अच्छी तरह मालूम हो गया कि अग्नि कामसंतप्त होकर वनमें चले गये हैं, तब उसने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया ॥ ४० १/२ ॥
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् ॥ ४१ ॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम् ।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥ ४२ ॥
मैं अग्निके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ। अतः स्वयं ही सप्तर्षिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवकी कामना करूँगी; क्योंकि वे उनके रूपसे मोहित हो रहे हैं। ऐसा करनेसे उन्हें प्रसन्नता होगी और मेरी कामना भी पूर्ण हो जायगी' ॥ ४१-४२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥

स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण

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पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण

मार्कण्डेय उवाच

शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता ।
तस्याः सा प्रथमं रूपं कृत्वा देवी जनाधिप ॥ १ ॥
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना ।
मामग्ने कामसंतप्तां त्वं कामयितुमर्हसि ॥ २ ॥
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय ।
अहमङ्गिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन ।
शिष्टाभिः प्रहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम् ॥ ३ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सद्गुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली—'अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है' ॥ १—३ ॥

अग्निरुवाच

कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् ।
यास्त्वया कीर्तिताः सर्वाः सप्तर्षीणां प्रियाः स्त्रियः ॥ ४ ॥

**अग्निने पूछा—**देवि! तुम तथा दूसरी सप्तर्षियोंकी सभी प्यारी स्त्रियाँ, जिनके विषयमें अभी तुमने चर्चा की है, कैसे जानती हैं कि मैं तुमलोगोंके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ ॥ ४ ॥

शिवोवाच

अस्माकं त्वं प्रियो नित्यं बिभीमस्तु वयं तव ।
त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम् ॥ ५ ॥
मैथुनायेह सम्प्राप्ता कामं प्राप्तं द्रुतं चर ।
जामयो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ॥ ६ ॥