महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1537, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया । तत्राभ्यगच्छद् देवेन्द्रो यत्र देवर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥ वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाबलाः । यह सुनकर देवराज इन्द्र ब्रह्माजीको नमस्कार करके उस कन्याको साथ ले जहाँ महान् शक्तिशाली वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं देवर्षि थे, वहाँ उनके आश्रमपर आये ॥ २५ १/२ ॥ भागार्थं तपसो धातुं तेषां सोमं तथाध्वरे ॥ २६ ॥ पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः । उन दिनों वे महर्षिगण जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें भाग लेनेके लिये तथा सोमपान करनेके लिये इन्द्र आदि सभी देवता वहाँ पधारे थे। उन सबके मनमें सोमपान की इच्छा थी ॥ २६ १/२ ॥ इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥ २७ ॥ जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम् । उन महात्मा ऋषियोंने प्रज्वलित अग्निमें शास्त्रीय विधिसे इष्टिका सम्पादन करके सम्पूर्ण देवताओंके लिये हविष्यकी आहुति दी ॥ २७ १/२ ॥ समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥ २८ ॥ विनिःसृत्य ययौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत् प्रभुः । आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥ २९ ॥ स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः । ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥ ३० ॥ भरतश्रेष्ठ! मन्त्रोंद्वारा आवाहन होनेपर वे अद्भुत नामक अग्नि सूर्यमण्डलसे निकलकर मौनभावसे वहाँ आये और ब्रह्मर्षियोंद्वारा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् हवन किये हुए भाँति-भाँतिके हवनीय पदार्थोंको उन महर्षियोंसे प्राप्त करके उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंकी सेवामें अर्पित किया ॥ निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत् स पत्नीस्तेषां महात्मनाम् । स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्वपन्तीश्च तथा सुखम् ॥ ३१ ॥ देवताओंको हविष्य पहुँचाकर जब अग्निदेव वहाँसे जाने लगे, तब उनकी दृष्टि उन महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंपर पड़ी। उनमेंसे कुछ तो अपने आसनोंपर बैठी थीं और कुछ सुखपूर्वक सो रही थीं' ॥ ३१ ॥ रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः । हुताशणार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥ ३२ ॥ उनकी अंगकान्ति सुवर्णमयी वेदीके समान गौर थी, वे चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल थीं, अग्निकी लपटोंके समान प्रभा बिखेर रही थीं और तारिकाओंके समान अद्भुत सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३२ ॥