भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1538

स तत्र तेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः । पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥ ३३ ॥ इस प्रकार वहाँ (आसक्तियुक्त) मनसे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंको देखकर अग्निदेवकी सारी इन्द्रियाँ क्षोभसे चञ्चल हो उठीं। वे सर्वथा कामके अधीन हो गये ॥ ३३ ॥

भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम् । साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामाः कामयाम्यहम् ॥ ३४ ॥ फिर उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि 'मेरा यह कार्य कदापि उचित नहीं है। मेरे मनमें विचार आ गया है। इन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियाँ पतिव्रता हैं। ये मुझे बिलकुल नहीं चाहतीं, तो भी मैं इनकी कामना करता हूँ ॥ ३४ ॥

नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः । गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥ ३५ ॥ 'मैं अकारण न तो इन्हें देख सकता हूँ और न इनका स्पर्श ही कर सकता हूँ। ऐसी दशामें यदि मैं गार्हपत्य अग्निमें प्रविष्ट हो जाऊँ तो बार-बार इनके दर्शनका अवसर पा सकता हूँ' ॥ ३५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः । पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥ ३६ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा निश्चय करके अग्निदेवने गार्हपत्य अग्निका आश्रय लिया और अपनी लपटोंसे स्वर्गकी-सी कान्तिवाली उन ऋषि-पत्नियोंका स्पर्श तथा दर्शन-सा करते हुए वे बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥

निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः । मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥ ३७ ॥ इस प्रकार बहुत देरतक वहाँ टिके रहकर अग्निदेव कामके वशमें हो गये। वे अपना हृदय उन सुन्दरियोंपर निछावर करके उनसे मिलनेकी कामना कर रहे थे ॥

कामसंतप्तहृदयो देहत्यागविनिश्चितः । अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥ ३८ ॥ उनका हृदय कामाग्निसे संतप्त हो रहा था। वे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके न मिलनेसे अपने शरीरको त्याग देनेका निश्चय कर चुके थे। अतः वनमें चले गये ॥

स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामयत् तदा । सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भाविनी ॥ ३९ ॥ प्रजापति दक्षकी पुत्री स्वाहा पहलेसे ही अग्निदेवको अपना पति बनाना चाहती थी और इसके लिये बहुत दिनोंसे वह अग्निका छिद्र ढूँढ़ रही थी ॥ ३९ ॥