भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1526

‘सह’ नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हड्डियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १४ ॥ यकृत् कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभुः प्रजाः । नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम् ॥ १५ ॥ और उनका यकृत् (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा—इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाड़ियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं ॥ १५ ॥ शरीराद् विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन् नृप । एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥ १६ ॥ राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥ भृग्वङ्गिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वल तेजस्वी तपसाऽऽप्यायितः शिखी ॥ १७ ॥ जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे ॥ १७ ॥ दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् । तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् । अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥ १८ ॥ महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा—अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ॥ १८ ॥ अथर्वा त्वसृजल्लोकानात्मनाऽऽलोक्य पावकम् । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ॥ १९ ॥ अथर्वाने सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रको मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की ॥ १९ ॥ एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा । आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥ २० ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ॥ २० ॥ एवं त्वजनयद् धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् । विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥ २१ ॥