भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1527

उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया ॥ २१ ॥

सिन्धुनदं पञ्चनदं देविकाथ सरस्वती ।
गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्वया ॥ २२ ॥
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा ।
ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥ २३ ॥
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा ।
वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत ॥ २४ ॥
भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा ।
तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥ २५ ॥
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ।

सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र—ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं ॥ २२—२५ १/२ ॥

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः ॥ २६ ॥
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ।
अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः ॥ २७ ॥

अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके ‘विभूरसि’ नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ २६-२७ ॥

अत्रिः पुत्रान् स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥ २८ ॥
तस्य तद्ब्रह्मणः कायान्निर्हरन्ति हुताशनाः ।

अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८ १/२ ॥

एवमेते महात्मानः कीर्तितास्तेऽग्नयो मया ॥ २९ ॥
अप्रमेया यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः ।

राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान् महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया ॥ २९ १/२ ॥

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् ॥ ३० ॥