महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येषु हुताशनः ।
वेदोंमें 'अद्भुत' नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है ।। ३० १/२ ।।
एक एवैष भगवान् विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ।। ३१ ।।
बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा ।
ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है ।। ३१ १/२ ।।
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया ।
योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ।। ३२ ।।
इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वारा पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं ।। ३२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि
आङ्गिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक अग्निप्रादुर्भावसम्बन्धी दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।
* 'सहसः पुत्रोऽद्भुतः' इति मन्त्रवर्णः।