महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1535, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरुणालयम् ॥ १३ ॥
ऐश्वर्यशाली इन्द्रने देखा, पूर्वसंध्या (प्रभात)-का समय है, प्राचीके आकाशमें लाल रंगके घने बादल घिर आये हैं और समुद्रका जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ १३ ॥
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः ।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥ १४ ॥
भृगु तथा अंगिरा गोत्रके ऋषियोंद्वारा पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन किये हुए हविष्यको ग्रहण करके अग्निदेव भी सूर्यमें ही प्रवेश करते हैं ॥ १४ ॥
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम् ।
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥ १५ ॥
उस समय भगवान् सूर्यके निकट चौबीसवाँ पर्व उपस्थित था; अर्थात् पहले जिस अमावस्यापर्वमें देवासुर-संग्राम हुआ था; उससे पूरे एक वर्षके बाद पुनः वैसा अवसर आया था। धर्मकी अर्थात् होम और संध्याकी वेलामें वह रौद्र मुहूर्त उपस्थित था और चन्द्रमा सूर्यकी राशिमें स्थित हो गये थे ॥ १५ ॥
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च ।
समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यकी एकता (एक राशिपर स्थिति) तथा रौद्र मुहूर्तका संयोग देखकर इन्द्र मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन करने लगे— ॥ १६ ॥
सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् ।
एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद् युद्धं तु शंसति ॥ १७ ॥
'अहो! इस समय चन्द्रमा और सूर्यपर यह भयंकर घेरा दिखायी दे रहा है। इससे सूचित होता है कि रात बीतते-बीतते भारी युद्ध छिड़ जायगा ॥ १७ ॥
सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम् ।
शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥ १८ ॥
'यह सिन्धु नदी भी उलटी धारामें बहकर रक्तके स्रोत बहा रही है। सियारिन मुँहसे आग उगलती हुई-सी सूर्यकी ओर देखकर रोती है ॥ १८ ॥
एष रौद्रश्च सङ्घातो महान् युक्तश्च तेजसा ।
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥ १९ ॥
'अनेक योगोंका यह भयंकर तथा महान् संघात (सम्मेलन) तेजसे आलोकित हो रहा है। अग्नि और सूर्यके साथ चन्द्रमाका यह अद्भुत समागम दृष्टिगोचर होता है ॥
जनयेद् यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ।
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता ॥ २० ॥
'जान पड़ता है, इस समय चन्द्रमा जिस पुत्रको जन्म देंगे, वही इस देवीका पति होगा अथवा अग्नि भी इन सभी अभीष्ट गुणोंसे युक्त हैं। वे भी देवकोटिमें ही हैं ॥