महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**कन्या बोली—**महाबाहो! मैं तो अबला हूँ। पिताजीके वरदानसे मेरे भावी पति बलवान् तथा देवदानव-वन्दित होंगे ।। ६ ।।
इन्द्र उवाच
कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ।। ७ ।।
**इन्द्रने पूछा—**देवि! तुम्हारे पतिका बल कैसा होगा? अनिन्दिते! यह बात मैं तुम्हारे ही मुँहसे सुनना चाहता हूँ ।। ७ ।।
कन्योवाच
देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ।। ८ ।।
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति ।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ।। ९ ।।
**कन्या बोली—**देवराज! जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस तथा दुष्ट दैत्योंको जीतनेवाला हो; जिसका पराक्रम महान् और बल असाधारण हो तथा जो तुम्हारे साथ रहकर समस्त प्राणियोंपर विजय प्राप्त कर सके, वह ब्राह्मणहितैषी तथा अपने यशकी वृद्धि करनेवाला वीर पुरुष मेरा पति होगा ।। ८-९ ।।
मार्कण्डेय उवाच
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम् ।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ।। १० ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! देवसेनाकी बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो सोचने लगे 'इस देवीको जैसा यह बता रही है, वैसा पति मिलना सम्भव नहीं जान पड़ता' ।। १० ।।
अथापश्यत् स उदये भास्करं भास्करद्युतिः ।
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ।। ११ ।।
तदनन्तर सूर्यके समान तेजस्वी इन्द्रने देखा, सूर्य उदयाचलपर आ गये हैं। महाभाग चन्द्रमा भी सूर्यमें ही प्रवेश कर रहे हैं ।। ११ ।।
अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहूर्ते रौद्र एव तु ।
देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ।। १२ ।।
अमावस्या आरम्भ हो गयी थी। उस रौद्र (भयंकर) मुहूर्तमें ही उदयगिरिके शिखरपर उन्हें देवासुर-संग्रामका लक्षण दिखायी दिया ।। १२ ।।
लोहितैश्च धनैर्युक्तां पूर्वा संध्यां शतक्रतुः ।