महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1544, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिःस्वनम् ॥ २२ ॥ उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह । तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स बालोऽर्कसमद्युतिः ॥ २३ ॥ द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना । अपरेणाग्निदायादस्ताम्रचूडं भुजेन सः ॥ २४ ॥ महाकायमुपश्लिष्टं कुक्कुटं बलिनां वरम् । गृहीत्वा व्यनदद् भीमं चिक्रीड च महाभुजः ॥ २५ ॥ ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्च्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज़ वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गे)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे ॥ २२—२५ ॥
द्वाभ्यां भुजाभ्यां बलवान् गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् । प्राध्मापयत भूतानां त्रासनं बलिनामपि ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उन बलवान् वीरने दोनों हाथोंमें उत्तम शंख लेकर बजाया, जो बलवान् प्राणियोंको भी भयभीत कर देनेवाला था ॥ २६ ॥
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं बहुशो निजघान ह । कीडन् भाति महासेनस्त्रींल्लोकान् वदनैः पिबन् ॥ २७ ॥ फिर वे दो भुजाओंसे आकाशको बार-बार पीटने लगे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए कुमार महासेन ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने मुखोंसे तीनों लोकोंको पी जायेंगे ॥ २७ ॥
पर्वताग्रेऽप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा । स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः ॥ २८ ॥ व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः । स पश्यन् विविधान् भावांश्चकार निनदं पुनः ॥ २९ ॥ तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जनाः । भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययुः ॥ ३० ॥ अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अद्भुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस