महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1545, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली।। २८—३०।। ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः। तानप्याहुः पारिषदान् ब्राह्मणाः सुमहाबलान्॥ ३१॥ उस समय जिन-जिन नाना वर्णवाले जीवोंने उन स्कन्ददेवकी शरण ली, उन सबको ब्राह्मणोंने उनका महाबलवान् पार्षद बताया है॥ ३१॥ स तूत्थाय महाबाहुरुपसान्त्व्य च तान् जनान्। धनुर्विकृष्य व्यसृजद् बाणान् श्वेते महागिरौ॥ ३२॥ उन महाबाहुने उठकर उन सब प्राणियोंको सान्त्वना दी और महापर्वत श्वेतपर खड़े-खड़े धनुष खींचकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी॥ ३२॥ बिभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम्। तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम्॥ ३३॥ उन बाणोंद्वारा उन्होंने हिमालयके पुत्र क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण कर दिया। उसी छिद्रमें होकर हंस और गृध्र पक्षी मेरु पर्वतको जाते हैं॥ ३३॥ स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान् रुवन्। तस्मिन् निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं तदा॥ ३४॥ स्कन्दके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो वह क्रौञ्च पर्वत अत्यन्त आर्तनाद करता हुआ गिर पड़ा। उस समय उसके गिरनेपर दूसरे पर्वत भी जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे॥ ३४॥ स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि बलिनां वरः। न प्राच्यवदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत्॥ ३५॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ और अमित आत्मबलसे सम्पन्न कुमार उन अत्यन्त आर्त पर्वतोंके उस चीत्कारको सुनकर भी विचलित नहीं हुए, अपितु हाथसे शक्तिको उठाकर सिंहनाद करने लगे॥ ३५॥ सा तदा विमला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना। बिभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः॥ ३६॥ उन महात्माने उस समय अपनी चमचमाती हुई शक्ति चलायी और उसके द्वारा श्वेत गिरिके भयानक शिखरको बड़े वेगसे विदीर्ण कर डाला॥ ३६॥ स तेनाभिहतो दीर्णो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह। उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः॥ ३७॥ इस प्रकार कार्तिकेयद्वारा शक्तिके आघातसे विदीर्ण होकर श्वेत पर्वत उन महात्माके भयसे डर गया और (दूसरे) पर्वतोंके साथ इस पृथ्वीको छोड़कर आकाशमें उड़ गया॥ ३७॥ ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः।