महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे लोगोंने उस गरुडी पक्षिणीसे कहा—‘तूने ही यह अनर्थ उपस्थित किया है’। यह उन लोगोंका विचार था, जिन्होंने स्वाहादेवीको गरुडीके रूपमें जाते देखा था। लोग यह नहीं जानते थे कि यह सारा कार्य स्वाहाने किया है ।। ५-६ ।।
सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममायं तनयस्त्विति । उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ॥ ७ ॥ गरुडीने लोगोंकी बातें सुनकर कहा—‘यह मेरा पुत्र है।’ फिर उसने धीरेसे स्कन्दके पास जाकर कहा—‘बेटा! मैं तुम्हें जन्म देनेवाली माता हूँ’ ।। ७ ।।
अथ सप्तर्षयः श्रुत्वा जातं पुत्रं महौजसम् । तत्यजुः षट् तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् ॥ ८ ॥ इधर सप्तर्षियोंने जब यह सुना कि हमारी छः पत्नियोंके रंगसे अग्निदेवके एक महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब उन्होंने अरुन्धती देवीके सिवा अन्य छः पत्नियोंको त्याग दिया ।। ८ ।।
षड्भिरेव तदा जातमाहुस्तद्वनवासिनः । सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽयमित्युत ॥ ९ ॥ अहं जाने नैतदेवमिति राजन् पुनः पुनः । क्योंकि उस वनके निवासियोंने उस समय छः पत्नियोंके गर्भसे ही उस बालककी उत्पत्ति बतायी थी। राजन्! यद्यपि स्वाहाने सप्तर्षियोंसे बार-बार कहा कि ‘यह मेरा पुत्र है। मैं इसके जन्मका रहस्य जानती हूँ; लोग जैसी बात उड़ा रहे हैं, वैसी नहीं है।’ (तो भी वे सहसा उसकी बातपर विश्वास न कर सके) ।। ९ १/२ ।।
विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः ॥ १० ॥ पावकं कामसंतप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तत् तेन निखिलं सर्वमवबुद्धं यथातथम् ॥ ११ ॥ महामुनि विश्वामित्र जब सप्तर्षियोंकी इष्टि पूर्ण कर चुके, तब वे भी कामपीड़ित अग्निके पीछे-पीछे गुप्तरूपसे चल दिये थे, उस समय कोई उन्हें देख नहीं पाता था। अतः उन्होंने यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे जान लिया ।। १०-११ ।।
विश्वामित्रस्तु प्रथमं कुमारं शरणं गतः । स्तवं दिव्यं सम्प्रचक्रे महासेनस्य चापि सः ॥ १२ ॥ विश्वामित्रजी सबसे पहले कुमार कार्तिकेयकी शरणमें गये तथा उन्होंने महासेनकी दिव्य स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी की ।। १२ ।।
मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रयोदश । जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाश्चक्रे महामुनिः ॥ १३ ॥ उन महामुनिने कुमारके सारे मांगलिक कृत्य सम्पन्न किये। जातकर्म आदि तेरह क्रियाओंका भी अनुष्ठान किया ।। १३ ।।