भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1549

षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्कुटस्य तु साधनम् ।
शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पार्षदामपि ।। १४ ।।
विश्वामित्रश्चकारैतत् कर्म लोकहिताय वै ।
तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत् प्रियः ।। १५ ।।
स्कन्दकी महिमा, उनके द्वारा कुक्कुट पक्षीका धारण, देवीके समान प्रभावशालिनी शक्तिका ग्रहण तथा पार्षदोंका वरण आदि कुमारके सभी कार्योंको विश्वामित्रने लोकहितके लिये आवश्यक सिद्ध किया। अतः विश्वामित्र मुनि कुमारके अधिक प्रिय हो गये ।। १४-१५ ।।
अन्वजानाच्च स्वाहाया रूपान्यत्वं महामुनिः ।
अब्रवीच्च मुनीन् सर्वान् नापराध्यन्ति वै स्त्रियः ।। १६ ।।
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात् ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन् ।
महामुनि विश्वामित्रने यह जान लिया था कि स्वाहाने अन्य ऋषिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवसे सम्बन्ध स्थापित किया था; इसलिये उन्होंने सब ऋषियोंसे कहा—'आपकी स्त्रियोंका कोई अपराध नहीं है' उनके मुखसे यथार्थ बात जानकर भी ऋषियोंने अपनी पत्नियोंको सर्वथा त्याग ही दिया ।। १६½ ।।

मार्कण्डेय उवाच

स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन् ।। १७ ।।
अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम् ।
यदि वा न निहंस्येनं देवेन्द्रोऽयं भविष्यति ।। १८ ।।
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबल ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! उस समय स्कन्दके जन्म और बल-पराक्रमका समाचार सुनकर सब देवताओंने एकत्र हो इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! स्कन्दका बल असह्य है। शीघ्र उन्हें मार डालिये; विलम्ब न कीजिये। महाबली इन्द्र! यदि आप इन्हें अभी नहीं मारते हैं तो ये त्रिलोकीको, हम सबको तथा आपको भी अपने वशमें करके 'देवेन्द्र' बन बैठेंगे' ।। १७-१८½ ।।
स तानुवाच व्यथितो बालोऽयं सुमहाबलः ।। १९ ।।
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशयेत् ।
न बालमुत्सहे हन्तुमिति शक्रः प्रभाषते ।। २० ।।
तब इन्द्रने व्यथित होकर उन देवताओंसे कहा—'देवताओ! यह बालक बड़ा बलवान् है। यह लोकस्रष्टा ब्रह्माको भी युद्धमें पराक्रम करके मार सकता है। अतः मुझमें इस बालकको मारनेका साहस नहीं है।' इन्द्र बार-बार यही बात दुहराने लगे ।। १९-२० ।।
तेऽब्रुवन् नास्ति ते वीर्यं यत एवं प्रभाषसे ।