भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1550

सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः ॥ २१ ॥
कामवीर्या घ्नन्तु चैनं तथेत्युक्त्वा च ता ययुः ।
यह सुनकर देवता बोले—'आपमें अब बल और पराक्रम नहीं रह गया है, इसीलिये ऐसी बातें कहते हैं। हमारी राय है कि सम्पूर्ण लोकमातृकाएँ स्कन्दके पास जायँ। ये इच्छानुसार पराक्रम प्रकट कर सकती हैं; अतः स्कन्दको मार डालें।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे मातृकाएँ वहाँसे चल दीं ॥ २१ ½ ॥
तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः ॥ २२ ॥
अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययुः ।
ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रो भव महाबल ॥ २३ ॥
परंतु स्कन्दका अप्रतिम बल देखकर उनके मुखपर उदासी छा गयी। वे सोचने लगीं—'इस वीरको पराजित करना असम्भव है।' ऐसा निश्चय होनेपर वे उन्हींकी शरणमें गयीं और बोलीं—'महाबली कुमार! तुम हमारे पुत्र हो जाओ, हमें माता मान लो ॥ २२-२३ ॥
अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः ।
तासां तद् वचनं श्रुत्वा पातुकामः स्तानान् प्रभुः ॥ २४ ॥
'देखो, हम पुत्र-स्नेहसे विकल हो रही हैं, हमारे स्तनोंसे दूध झर रहा है इसे पीकर हम सबको सम्मानित और आनन्दित करो।' मातृकाओंकी यह बात सुनकर समर्थ स्कन्दके मनमें उनके स्तनपानकी इच्छा जाग्रत हो गयी ॥ २४ ॥
ताः सम्पूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय सः ।
अपश्यदग्निमायान्तं पितरं बलिनां बली ॥ २५ ॥
फिर महासेनने उन सबका समादर करके उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण की। तदनन्तर बलवानोंमें बलिष्ठ वीर स्कन्दने अपने पिता अग्निदेवको आते देखा ॥ २५ ॥
स तु सम्पूजितस्तेन सह मातृगणेन ह ।
परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः शिवः ॥ २६ ॥
कुमार महासेनके द्वारा पूजित हो मंगलकारी अग्निदेव मातृकागणोंके साथ उन्हें घेरकर खड़े हो गये और उनकी रक्षा करने लगे ॥ २६ ॥
सर्वासां या तु मातृणां नारी क्रोधसमुद्भवा ।
धात्री स्वपुत्रवत् स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ॥ २७ ॥
उस समय सम्पूर्ण मातृकाओंके क्रोधसे जो एक नारीमूर्ति प्रकट हुई थी, वह हाथमें त्रिशूल ले धायकी भाँति अपने पुत्रके समान प्रिय स्कन्दकी सब ओरसे रक्षा करने लगी ॥ २७ ॥
लोहितस्योदधेः कन्या क्रूरा लोहितभोजना ।
परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत् पर्य्यरक्षत ॥ २८ ॥