महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1553, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंहर्षयन् देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर! महाबली देवराज इन्द्र अग्निनन्दन स्कन्दको मार डालनेकी इच्छासे देवताओंकी सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए तीव्र गतिसे विकट गर्जनाके साथ आगे बढ़ रहे थे ॥ ७ ॥
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः । समीपमथ सम्प्राप्तः कार्तिकेयस्य वासवः ॥ ८ ॥ सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितः सुरैः । गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत् सागरो यथा ॥ ९ ॥ उस समय सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनका बड़ा सम्मान कर रहे थे। जब देवराज इन्द्र कुमार कार्तिकेयके निकट पहुँचे, तब उन्होंने देवताओंके साथ सिंहके समान गर्जना की। उनका वह सिंहनाद सुनकर कुमार कार्तिकेय भी समुद्रके समान भयंकर गर्जना करने लगे ॥ ८-९ ॥
तस्य शब्देन महता समुद्भूतोदधिप्रभम् । बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥ १० ॥ देवताओंकी सेना उमड़ते हुए समुद्रके समान जान पड़ती थी। परंतु स्कन्दकी भारी गर्जनासे अचेत-सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी ॥ १० ॥
जिघांसूनुपसम्प्राप्तान् देवान् दृष्ट्वा स पावकिः । विससर्ज मुखात् क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥ ११ ॥ अग्निकुमार स्कन्द यह देखकर कि देवतालोग मेरा वध करनेकी इच्छासे यहाँ एकत्र हुए हैं, कुपित हो उठे और अपने मुँहसे आगकी बढ़ती हुई लपटें छोड़ने लगे ॥ ११ ॥
अदहद् देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले । ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः ॥ १२ ॥ इस प्रकार उन्होंने देवताओंकी सेनाको जलाना प्रारम्भ किया। सारे सैनिक पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। किसीका शरीर जल गया, किसीका सिर, किसीके आयुध जल गये और किसीके वाहन ॥ १२ ॥
प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव । दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥ १३ ॥ देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः । त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥ १४ ॥ वे सब-के-सब सहसा तितर-बितर हो आकाशमें बिखरे हुए तारोंके समान जान पड़ते थे। इस तरह जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्रका साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्दकी ही शरणमें आये, तब उन्हें शान्ति मिली। देवताओंके त्याग देनेपर इन्द्रने स्कन्दपर अपने वज्रका प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥