महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1554, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् । बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ महाराज! इन्द्रके छोड़े हुए उस वज्रने शीघ्र ही कुमार कार्तिकेयकी दायीं पसलीपर गहरी चोट पहुँचायी और उन महामना स्कन्दके पार्श्वभागको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः । युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग् दिव्यकुण्डलः ॥ १६ ॥ वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके (उस दक्षिण पार्श्वसे) एक दूसरा वीर पुरुष प्रकट हुआ, जिसकी युवावस्था थी। उसने सुवर्णमय कवच धारण कर रखा था। उसके एक हाथमें शक्ति चमक रही थी और कानोंमें दिव्य कुण्डल झलमला रहे थे ॥ १६ ॥ यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् । संजातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् ॥ १७ ॥ भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः । वज्रके प्रविष्ट होनेसे उसकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये वह विशाख नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी उस द्वितीय वीरको प्रकट हुआ देख इन्द्र भयसे थर्रा उठे और हाथ जोड़कर उन स्कन्ददेवकी शरणमें आये ॥ १७½ ॥ तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः । ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥ १८ ॥ तब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ कुमार स्कन्दने सेनासहित इन्द्रको अभयदान दिया। इससे प्रसन्न होकर सब देवता (हर्षसूचक) बाजे बजाने लगे ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे इन्द्रस्कन्दसमागमे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें इन्द्र-स्कन्दसमागमविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥