भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1568

**स्कन्द बोले—**वन्दनीय सतियो! आपलोग मेरी माताएँ हैं और मैं आप सबका पुत्र हूँ। इसके सिवा यदि आप लोगोंकी और कोई इच्छा हो तो वह भी पूर्ण हो जायगी ।। ६ ।।

मार्कण्डेय उवाच

विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत् । उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवतस्तः ।। ७ ।। **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर इन्द्रको कुछ कहनेके लिये उत्सुक देख स्कन्दने पूछा—'क्या काम है, कहिये।' स्कन्दके इस प्रकार आदेश देनेपर इन्द्र बोले— ।। ७ ।।

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा । इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ।। ८ ।। ‘रोहिणीकी छोटी बहिन अभिजित् देवी स्पर्धाके कारण ज्येष्ठता पानेकी इच्छासे तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयी है ।। ८ ।।

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् । कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ।। ९ ।। ‘तुम्हारा कल्याण हो, आकाशसे यह एक नक्षत्र च्युत हो गया है; (इसकी पूर्ति कैसे हो?) इस प्रश्नको लेकर मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया हूँ। स्कन्द! तुम ब्रह्माजीके साथ मिलकर