महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1569, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस उत्तम काल (मुहूर्त या नक्षत्र) की पूर्तिके उपायका विचार करो ॥ ९ ॥ धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः । रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥ 'अभिजित्का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही (सत्ययुग आदि) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया (क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था)। इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था (क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था)—इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन-संख्या उन दिनों सम थी' ॥ १० ॥ एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः । नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥ इन्द्रके उपर्युक्त प्रस्ताव करनेपर उनका आशय समझकर छहों कृत्तिकाएँ अभिजित्के स्थानकी पूर्ति करनेके लिये आकाशमें चली गयीं। वह अग्निदेवता-सम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्र सात सिरोंकी आकृतिमें प्रकाशित हो रहा है ॥ ११ ॥ विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः । इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥ गरुड़जातीय विनताने स्कन्दसे कहा—'बेटा! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो। मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ' ॥ १२ ॥
स्कन्द उवाच
एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम् । स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥ **स्कन्दने कहा—**एवमस्तु (ऐसा ही हो), मा! तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे ऊपर पुत्रोचित स्नेह रखकर कर्तव्यका आदेश देती रहो। देवि! तुम यहाँ सदा अपनी पुत्रवधू देवसेनाद्वारा सम्मानित होकर रहोगी ॥ १३ ॥
मार्कण्डेय उवाच
अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत् । वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः । इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर समस्त मातृगणोंने आकर स्कन्दसे कहा—'बेटा! विद्वानोंने हमें सम्पूर्ण लोकोंकी माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता होना चाहती हैं। तुम मातृभावसे हमारा पूजन करो' ॥ १४ ॥
स्कन्द उवाच
मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः ।