भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1573

नरेश्वर! कुत्तोंकी माता जो देवजातीय सरमा है, वह भी सदैव मानवीय स्त्रियोंके गर्भस्थ बालकोंका अपहरण करती रहती है ।। ३४ ।। पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा । वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ।। ३५ ।। जो वृक्षोंकी माता है, वह करंजवृक्षपर निवास किया करती है। वह वर देनेवाली तथा सौम्य है और सदा समस्त प्राणियोंपर कृपा करती है ।। ३५ ।। करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात् पुत्रार्थिनो नराः । इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ।। ३६ ।। द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे । कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ।। ३७ ।। भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते । इसीलिये पुत्रार्थी मनुष्य करंजवृक्षपर रहनेवाली उस देवीको नमस्कार करते हैं। ये तथा दूसरे अठारह ग्रह मांस और मधुके प्रेमी हैं और दस राततक सूतिका-गृहमें निरन्तर टिके रहते हैं। कद्रू सूक्ष्म शरीर धारण करके गर्भिणी स्त्रीके शरीरके भीतर प्रवेश कर जाती है और वहाँ उस गर्भको खा जाती है। इससे वह गर्भिणी स्त्री सर्प पैदा करती है ।। ३६-३७ १/२ ।।

गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति ।। ३८ ।। ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते । जो गन्धर्वोंकी माता है, वह गर्भिणी स्त्रीके गर्भको लेकर चल देती है, जिससे उस मानवी स्त्रीका गर्भ विलीन हुआ देखा जाता है ।। ३८ १/२ ।।

या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ।। ३९ ।। उपनष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः । जो अप्सराओंकी माता है, वह भी गर्भको पकड़ लेती है, जिससे बुद्धिमान् मनुष्य कहते हैं कि अमुक स्त्रीका गर्भ नष्ट हो गया ।। ३९ १/२ ।।

लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ।। ४० ।। लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते । लालसागरकी कन्याका नाम लोहितायनि है, जिसे स्कन्दकी धाय बताया गया है। उसकी कदम्बवृक्षोंमें पूजा की जाती है ।। ४० १/२ ।।

पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ।। ४१ ।। आर्या माता कुमारस्य पृथक् कामार्थमिज्यते । एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ।। ४२ ।। यावत् षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः ।