भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1574

जैसे पुरुषोंमें भगवान् रुद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार स्त्रियोंमें आर्या उत्तम मानी गयी हैं। आर्या कुमार कार्तिकेयकी जननी हैं। लोग अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये उनका उपर्युक्त ग्रहोंसे पृथक् पूजन करते हैं। इस प्रकार मैंने ये कुमारसम्बन्धी महान् ग्रह बताये हैं। जबतक सोलह वर्षकी अवस्था न हो जाय, तबतक ये बालकोंका अमंगल करनेवाले होते हैं॥ ४१-४२ १/२ ॥

ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ।। ४३ ।। सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः । जो मातृगण और पुरुषग्रह बताये गये हैं, इन सबको समस्त देहधारी मनुष्य सदा 'स्कन्दग्रह' के नामसे जाने* ॥ ४३ १/२ ॥

तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम् । बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषतः ।। ४४ ।। स्नान, धूप, अञ्जन, बलिकर्म, उपहार अर्पण तथा स्कन्ददेवकी विशेष पूजा करके इन स्कन्दग्रहोंकी शान्ति करनी चाहिये ॥ ४४ ॥

एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् । आयुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ।। ४५ ।। राजेन्द्र! इस प्रकार पूजित तथा विधिवत् पूजनद्वारा अभिवन्दित होनेपर वे सभी ग्रह मनुष्योंका मंगल करते हैं और उन्हें आयु तथा बल देते हैं ॥ ४५ ॥

ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद् ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् । तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ।। ४६ ।। अब मैं भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उन ग्रहोंका परिचय दूँगा, जो सोलह वर्षकी अवस्थाके बाद मनुष्योंके लिये अनिष्टकारक होते हैं ॥ ४६ ॥

यः पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ।। ४७ ।। जो मनुष्य जागते या सोतेमें देवताओंको देखता और तुरंत पागल हो जाता है, उस कष्ट देनेवाले ग्रहको 'देवग्रह' कहते हैं ॥ ४७ ॥

आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ।। ४८ ।। जो मनुष्य बैठे-बैठे या सोते समय पितरोंको देखता और शीघ्र पागल हो जाता है, उस बाधा देनेवाले ग्रहको 'पितृग्रह' जानना चाहिये ॥ ४८ ॥

अवमन्यति यः सिद्धान् क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ।। ४९ ।।