महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1575, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो सिद्ध पुरुषोंका अनादर करता है और क्रोधमें आकर वे सिद्ध पुरुष जिसे शाप दे देते हैं, जिसके कारण वह तुरंत पागल हो जाता है, उसे 'सिद्धग्रह' की बाधा प्राप्त हुई है, ऐसा समझना चाहिये ।। ४९ ।। उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः ।। ५० ।। जो विभिन्न सुगन्धोंको सूँघता तथा रसोंका आस्वादन करता है एवं तत्काल ही उन्मत्त हो उठता है, उसपर प्रभाव डालनेवाले ग्रहको 'राक्षसग्रह' जानना चाहिये ।। गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः ।। ५१ ।। भूतलपर जिस मनुष्यमें दिव्य गन्धर्वोंका आवेश होता है, वह भी शीघ्र ही उन्मादग्रस्त हो जाता है। इसे 'गान्धर्वग्रह' की ही बाधा समझनी चाहिये ।। ५१ ।। अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः ।। ५२ ।। जिस पुरुषपर सदा पिशाच चढ़े रहते हैं, वह भी शीघ्र पागल हो जाता है। अतः वह 'पिशाचग्रह' की ही बाधा है ।। ५२ ।। आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ।। ५३ ।। कालक्रमसे जिस पुरुषमें यक्षोंका आवेश होता है, उसे भी पागल होते देर नहीं लगती। इसे 'यक्षग्रह' की बाधा जाननी चाहिये ।। ५३ ।। यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ।। ५४ ।। जिस देहधारी मनुष्यका चित्त वात, पित्त और कफ नामक दोषोंके कुपित होनेसे अपनी संज्ञा खो बैठता है, वह शीघ्र ही विक्षिप्त हो जाता है। उसकी वैद्यक शास्त्रके अनुसार चिकित्सा करानी चाहिये ।। ५४ ।। वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम् ।। ५५ ।। जो घबराहट, भय तथा घोर वस्तुओंके दर्शनसे ही तत्काल पागल हो जाता है, उनके अच्छे होनेका उपाय केवल उसे सान्त्वना देना है ।। ५५ ।। कश्चित् क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः । अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ।। ५६ ।। कोई ग्रह क्रीडा-विनोदकी, कोई भोजनकी और कोई कामोपभोगकी इच्छा रखता है, इस प्रकार ग्रहोंकी प्रकृति तीन प्रकारकी है ।। ५६ ।। यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् ।