महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1576, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ॥ ५७ ॥
जबतक सत्तर वर्षकी अवस्था पूरी होती है, तबतक ये ग्रह मनुष्योंको सताते हैं। उसके बाद तो सभी देहधारियोंको ज्वर आदि रोग ही ग्रहोंके समान सताने लगते हैं ॥ ५७ ॥
अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् ।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः ॥ ५८ ॥
जिसने अपनी इन्द्रियोंको सब ओरसे समेट लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस पुरुषको ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं—उसे दूरसे ही त्याग देते हैं ॥ ५८ ॥
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः ।
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम् ॥ ५९ ॥
राजन्! इस प्रकार मैंने मनुष्योंको जो ग्रहोंकी बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो भगवान् महेश्वरके भक्त हैं, उन मनुष्योंको भी ये ग्रह नहीं छूते हैं ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे मनुष्यग्रहकथने
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३० ॥
* मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ये तामस स्कन्दग्रह भगवान् रुद्रके भूत-प्रेतादि गणोंकी भाँति कुमार स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न तमोमय कुमारके साथी माने जाते हैं। इन ग्रहोंसे रक्षा पानेके लिये भगवान् महेश्वरकी भक्ति करनी चाहिये। भय दिखाकर भी भगवान्की भक्ति करानेमें हेतुभूत होनेके कारण इन ग्रहोंका वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान्के भक्तोंको ये ग्रह छू भी नहीं सकते। तमोगुणी प्रजापर ही सब तामस ग्रहोंका बल काम करता है। और वही इनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं।