महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना
वासुदेव उवाच
शाल्वबाणार्दिते तस्मिन् प्रद्युम्ने बलिनां वरे ।
वृष्णयो भग्नसंकल्पा विव्यथुः पृतनागताः ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्न जब शाल्वके बाणोंसे पीड़ित हो (मूर्च्छित हो) गये, तब सेनामें आये हुए वृष्णिवंशी वीरोंका उत्साह भंग हो गया। उन सबको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥
हाहाकृतमभूत् सर्वं वृष्ण्यन्धकबलं ततः ।
प्रद्युम्ने मोहिते राजन् परे च मुदिता भृशम् ॥ २ ॥
राजन्! प्रद्युम्नके मोहित होनेपर वृष्णि और अन्धकवंशकी सारी सेनामें हाहाकार मच गया और शत्रुलोग अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ २ ॥
तं तथा मोहितं दृष्ट्वा सारथिर्जवनैर्हयैः ।
रणादपाहरत् तूर्णं शिक्षितो दारुकिस्तदा ॥ ३ ॥
दारुकका पुत्र प्रद्युम्नका सुशिक्षित सारथि था। वह प्रद्युम्नको इस प्रकार मूर्च्छित देख वेगशाली अश्वोंद्वारा उन्हें तुरंत रणभूमिसे बाहर ले गया ॥ ३ ॥
नातिदूरापयाते तु रथे रथवरप्रणुत् ।
धनुर्गृहीत्वा यन्तारं लब्धसंज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥
अभी वह रथ अधिक दूर नहीं जाने पाया था, तभी बड़े-बड़े रथियोंको परास्त करनेवाले प्रद्युम्न सचेत हो गये और हाथमें धनुष लेकर सारथिसे इस प्रकार बोले— ॥ ४ ॥
सौते किं ते व्यवसितं कस्माद् यासि पराङ्मुखः ।
नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ॥ ५ ॥
'सूतपुत्र! आज तूने क्या सोचा है? क्यों युद्धसे मुँह मोड़कर भागा जा रहा है? युद्धसे पलायन करना वृष्णिवंशी वीरोंका धर्म नहीं है ॥ ५ ॥
कच्चित् सौते न ते मोहः शाल्वं दृष्ट्वा महाहवे ।
विषादो वा रणं दृष्ट्वा ब्रूहि मे त्वं यथातथम् ॥ ६ ॥