महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘सूतनन्दन! इस महासंग्राममें राजा शाल्वको देखकर तुझे मोह तो नहीं हो गया है? अथवा युद्ध देखकर तुझे विषाद तो नहीं होता है? मुझसे ठीक-ठीक बता (तेरे इस प्रकार भागनेका क्या कारण है?)’ ॥ ६ ॥
सौतिरुवाच
जानार्दने न मे मोहो नापि मां भयमाविशत् । अतिभारं तु ते मन्ये शाल्वं केशवनन्दन ॥ ७ ॥ **सूतपुत्रने कहा—**जनार्दनकुमार! न मुझे मोह हुआ है और न मेरे मनमें भय ही समाया है। केशवनन्दन! मुझे ऐसा मालूम होता है कि यह राजा शाल्व आपके लिये अत्यन्त भार-सा हो रहा है ॥ ७ ॥
सोऽपयामि शनैर्वीर बलवानेष पापकृत् । मोहितश्च रणे शूरो रक्ष्यः सारथिना रथी ॥ ८ ॥ वीरवर! मैं धीरे-धीरे रणभूमिसे दूर इसलिये जा रहा हूँ कि यह पापी शाल्व बड़ा बलवान् है। सारथिका यह धर्म है कि यदि शूरवीर रथी संग्राममें मूर्च्छित हो जाय तो वह किसी प्रकार उसके प्राणोंकी रक्षा करे ॥ ८ ॥
आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाप्यहम् । रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वोपयाम्यहम् ॥ ९ ॥ आयुष्मन्! मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी चाहिये। रथी सारथिके द्वारा सदा रक्षणीय है, इस कर्तव्यका विचार करके ही मैं रणभूमिसे लौट रहा हूँ ॥ ९ ॥
एकश्चासि महाबाहो बहवश्चापि दानवाः । न समं रौक्मिणेयाहं रणे मत्वापयामि वै ॥ १० ॥ महाबाहो! आप अकेले हैं और इन दानवोंकी संख्या बहुत है। रुक्मिणीनन्दन! इस युद्धमें इतने विपक्षियोंका सामना करना अकेले आपके लिये कठिन है; यह सोचकर ही मैं युद्धसे हट रहा हूँ ॥ १० ॥
एवं ब्रुवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् । उवाच सूतं कौरव्य निवर्तय रथं पुनः ॥ ११ ॥ दारुकात्मज मैवं त्वं पुनः कार्षीः कथंचन । व्यपयानं रणात् सौते जीवतो मम कर्हिचित् ॥ १२ ॥ कुरुनन्दन! सूतके ऐसा कहनेपर मकरध्वज प्रद्युम्नने उससे कहा—‘दारुककुमार! तू रथको पुनः युद्धभूमिकी ओर लौटा ले चल। सूतपुत्र! आजसे फिर कभी किसी प्रकार भी मेरे जीते-जी रथको रणभूमिसे न लौटाना ॥ ११-१२ ॥
न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति संगरम् । यो वा निपतितं हन्ति तवास्मीति च वादिनम् ॥ १३ ॥