महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
‘सूतनन्दन! इस महासंग्राममें राजा शाल्वको देखकर तुझे मोह तो नहीं हो गया है? अथवा युद्ध देखकर तुझे विषाद तो नहीं होता है? मुझसे ठीक-ठीक बता (तेरे इस प्रकार भागनेका क्या कारण है?)’ ॥ ६ ॥
सौतिरुवाच
जानार्दने न मे मोहो नापि मां भयमाविशत् । अतिभारं तु ते मन्ये शाल्वं केशवनन्दन ॥ ७ ॥ **सूतपुत्रने कहा—**जनार्दनकुमार! न मुझे मोह हुआ है और न मेरे मनमें भय ही समाया है। केशवनन्दन! मुझे ऐसा मालूम होता है कि यह राजा शाल्व आपके लिये अत्यन्त भार-सा हो रहा है ॥ ७ ॥
सोऽपयामि शनैर्वीर बलवानेष पापकृत् । मोहितश्च रणे शूरो रक्ष्यः सारथिना रथी ॥ ८ ॥ वीरवर! मैं धीरे-धीरे रणभूमिसे दूर इसलिये जा रहा हूँ कि यह पापी शाल्व बड़ा बलवान् है। सारथिका यह धर्म है कि यदि शूरवीर रथी संग्राममें मूर्च्छित हो जाय तो वह किसी प्रकार उसके प्राणोंकी रक्षा करे ॥ ८ ॥
आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाप्यहम् । रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वोपयाम्यहम् ॥ ९ ॥ आयुष्मन्! मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी चाहिये। रथी सारथिके द्वारा सदा रक्षणीय है, इस कर्तव्यका विचार करके ही मैं रणभूमिसे लौट रहा हूँ ॥ ९ ॥
एकश्चासि महाबाहो बहवश्चापि दानवाः । न समं रौक्मिणेयाहं रणे मत्वापयामि वै ॥ १० ॥ महाबाहो! आप अकेले हैं और इन दानवोंकी संख्या बहुत है। रुक्मिणीनन्दन! इस युद्धमें इतने विपक्षियोंका सामना करना अकेले आपके लिये कठिन है; यह सोचकर ही मैं युद्धसे हट रहा हूँ ॥ १० ॥
एवं ब्रुवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् । उवाच सूतं कौरव्य निवर्तय रथं पुनः ॥ ११ ॥ दारुकात्मज मैवं त्वं पुनः कार्षीः कथंचन । व्यपयानं रणात् सौते जीवतो मम कर्हिचित् ॥ १२ ॥ कुरुनन्दन! सूतके ऐसा कहनेपर मकरध्वज प्रद्युम्नने उससे कहा—‘दारुककुमार! तू रथको पुनः युद्धभूमिकी ओर लौटा ले चल। सूतपुत्र! आजसे फिर कभी किसी प्रकार भी मेरे जीते-जी रथको रणभूमिसे न लौटाना ॥ ११-१२ ॥
न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति संगरम् । यो वा निपतितं हन्ति तवास्मीति च वादिनम् ॥ १३ ॥
‘वृष्णिवंशमें ऐसा कोई (वीर पुरुष) नहीं पैदा हुआ है, जो युद्ध छोड़कर भाग जाय अथवा गिरे हुएको तथा ‘मैं आपका हूँ’ यह कहनेवालेको मारे ।। १३ ।।
तथा स्त्रियं च यो हन्ति बालं वृद्धं तथैव च ।
विरथं विप्रकीर्णं च भग्नशस्त्रायुधं तथा ।। १४ ।।
‘इसी प्रकार स्त्री, बालक, वृद्ध, रथहीन, अपने पक्षसे बिछुड़े हुए तथा जिसके अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये हों, ऐसे लोगोंपर जो हथियार उठाता हो, ऐसा मनुष्य भी वृष्णिकुलमें नहीं उत्पन्न हुआ है ।। १४ ।।
त्वं च सूतकुले जातो विनीतः सूतकर्मणि ।
धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ।। १५ ।।
‘दारुककुमार! तू सूतकुलमें उत्पन्न होनेके साथ ही सूतकर्मकी अच्छी तरह शिक्षा पा चुका है। वृष्णिवंशी वीरोंका युद्धमें क्या धर्म है, यह भी भली-भाँति जानता है ।। १५ ।।
स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे ।
अपयानं पुनः सूते मैवं कार्षीः कथंचन ।। १६ ।।
‘सूतनन्दन! युद्धके मुहानेपर डटे हुए वृष्णिकुलके वीरोंका सम्पूर्ण चरित्र तुझसे अज्ञात नहीं है; अतः तू फिर कभी किसी तरह भी युद्धसे न लौटना ।। १६ ।।
अपयातं हतं पृष्ठे भ्रान्तं रणपलायितम् ।
गदाग्रजो दुराधर्षः किं मां वक्ष्यति माधवः ।। १७ ।।
‘युद्धसे लौटने या भ्रान्तचित्त होकर भागनेपर जब मेरी पीठमें शत्रुके बाणोंका आघात लगा हो, उस समय किसीसे परास्त न होनेवाले मेरे पिता गदाग्रज भगवान् माधव मुझसे क्या कहेंगे? ।। १७ ।।
केशवस्याग्रजो वापि नीलवासा मदोत्कटः ।
किं वक्ष्यति महाबाहुर्बलदेवः समागतः ।। १८ ।।
‘अथवा पिताजीके बड़े भाई नीलाम्बरधारी मदोत्कट महाबाहु बलरामजी जब यहाँ पधारेंगे, तब वे मुझसे क्या कहेंगे? ।। १८ ।।
किं वक्ष्यति शिनेर्नप्ता नरसिंहो महाधनुः ।
अपयातं रणात् सूत साम्बश्च समितिंजयः ।। १९ ।।
‘सूत! युद्धसे भागनेपर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी महाधनुर्धर सात्यकि तथा समरविजयी साम्ब मुझसे क्या कहेंगे? ।। १९ ।।
चारुदेष्णश्च दुर्धर्षस्तथैव गदसारणौ ।
अक्रूरश्च महाबाहुः किं मां वक्ष्यति सारथे ।। २० ।।
‘सारथे! दुर्धर्ष वीर चारुदेष्ण, गद, सारण और महाबाहु अक्रूर मुझसे क्या कहेंगे? ।। २० ।।
शूरं सम्भावितं शान्तं नित्यं पुरुषमानिनम् ।
स्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संहताः ॥ २१ ॥ ‘मैं शूरवीर, सम्भावित (सम्मानित), शान्तस्वभाव तथा सदा अपनेको वीर पुरुष माननेवाला समझा जाता हूँ। (युद्धसे भागनेपर) मुझे देखकर झुंड-की-झुंड एकत्र हुई वृष्णिवीरोंकी स्त्रियाँ मुझे क्या कहेंगी? ॥ २१ ॥
प्रद्युम्नोऽयमुपायाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् । धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ॥ २२ ॥ ‘सब लोग यही कहेंगे—‘यह प्रद्युम्न भयभीत हो महान् संग्राम छोड़कर भागा आ रहा है; इसे धिक्कार है।’ उस अवस्थामें किसीके मुखसे मेरे लिये अच्छे शब्द नहीं निकलेंगे ॥ २२ ॥
धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्धिधस्य वा । मृत्युनाभ्यधिकः सौते स त्वं मा व्यपयाः पुनः ॥ २३ ॥ ‘सूतकुमार! मेरे अथवा मेरे-जैसे किसी भी पुरुषके लिये धिक्कारयुक्त वाणीद्वारा कोई परिहास भी कर दे तो वह मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है; अतः तू फिर कभी युद्ध छोड़कर न भागना ॥ २३ ॥
भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरिः । यज्ञं भारतसिंहस्य न हि शक्योऽद्य मर्षितुम् ॥ २४ ॥ ‘मेरे पिता मधुसूदन भगवान् श्रीहरि यहाँकी रक्षाका सारा भार मुझपर रखकर भरतवंशशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें गये हैं। (आज मुझसे जो अपराध हो गया है,) इसे वे कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे ॥ २४ ॥
कृतवर्मा मया वीरो निर्यास्यन्नेव वारितः । शाल्वं निवारयिष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ॥ २५ ॥ ‘सूतपुत्र! वीर कृतवर्मा शाल्वका सामना करनेके लिये पुरीसे बाहर आ रहे थे; किंतु मैंने उन्हें रोक दिया और कहा—‘आप यहीं रहिये। मैं शाल्वको परास्त करूँगा’ ॥ २५ ॥
स च सम्भावयन् मां वै निवृत्तो हृदिकात्मजः । तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथम् ॥ २६ ॥ ‘कृतवर्मा मुझे इस कार्यके लिये समर्थ जानकर युद्धसे निवृत्त हो गये। आज युद्ध छोड़कर जब मैं उन महारथी वीरसे मिलूँगा, तब उन्हें क्या जवाब दूँगा? ॥ २६ ॥
उपयान्तं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् । पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥ २७ ॥ ‘शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले कमलनयन महाबाहु एवं अजेय वीर भगवान् पुरुषोत्तम जब यहाँ मेरे निकट पदार्पण करेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? ॥ २७ ॥
सात्यकिं बलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णयः । मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ॥ २८ ॥
'सात्यकिसे, बलरामजीसे तथा अन्धक और वृष्णिवंशके अन्य वीरोंसे, जो सदा मुझसे स्पर्धा रखते हैं, मैं क्या कहूँगा? ।। २८ ।।
त्यक्त्वा रणमिमं सौते पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ।
त्वयापनीतो विवशो न जीवेयं कथंचन ।। २९ ।।
'सूतपुत्र! तेरे द्वारा रणसे दूर लाया हुआ मैं इस युद्धको छोड़कर और पीठपर बाणोंकी चोट खाकर विवशतापूर्ण जीवन किसी प्रकार भी नहीं धारण करूँगा ।। २९ ।।
स निवर्त रथेनाशु पुनर्दारुकनन्दन ।
न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथंचन ।। ३० ।।
'दारुकनन्दन! अतः तू शीघ्र ही रथके द्वारा पुनः संग्रामभूमिकी ओर लौट। आजसे मुझपर आपत्ति आनेपर भी तू किसी तरह ऐसा बर्ताव न करना ।। ३० ।।
न जीवितमहं सौते बहु मन्ये कथंचन ।
अपयातो रणाद् भीतः पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ।। ३१ ।।
'सूतपुत्र! पीठपर बाणोंकी चोट खाकर भयभीत हो युद्धसे भागनेवालेके जीवनको मैं किसी प्रकार भी अधिक आदर नहीं देता ।। ३१ ।।
कदापि सूतपुत्र त्वं जानीषे मां भयार्दितम् ।
अपयातं रणं हित्वा यथा कापुरुषं तथा ।। ३२ ।।
'सूतपुत्र! क्या तू मुझे कायरोंकी तरह भयसे पीड़ित और युद्ध छोड़कर भागा हुआ समझता है? ।। ३२ ।।
न युक्तं भवता त्यक्तुं संग्रामं दारुकात्मज ।
मयि युद्धार्थिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम् ।। ३३ ।।
'दारुककुमार! तुझे संग्रामभूमिका परित्याग करना कदापि उचित नहीं था। विशेषतः उस अवस्थामें, जब कि मैं युद्धकी अभिलाषा रखता था। अतः जहाँ युद्ध हो रहा है, वहाँ चल' ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
अष्टादशोऽध्यायः ।। १८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८ ।।
अध्याय (पृष्ठ 166)
एकोनविंशोऽध्यायः
प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय
वासुदेव उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेय सूतपुत्रस्ततोऽब्रवीत् ।
प्रद्युम्नं बलिनां श्रेष्ठं मधुरं श्लक्ष्णमञ्जसा ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—कुन्तीनन्दन! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर सूतपुत्रने शीघ्र ही बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नसे थोड़े शब्दोंमें मधुरतापूर्वक कहा— ॥ १ ॥
न मे भयं रौक्मिणेय संग्रामे यच्छतो हयान् ।
युद्धज्ञोऽस्मि च वृष्णीनां नात्र किंचिदतोऽन्यथा ॥ २ ॥
'रुक्मिणीनन्दन! संग्रामभूमिमें घोड़ोंकी बागडोर सँभालते हुए मुझे तनिक भी भय नहीं होता। मैं वृष्णिवंशियोंके युद्धधर्मको भी जानता हूँ। आपने जो कुछ कहा है, उसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है ॥ २ ॥
आयुष्मन्नुपदेशस्तु सारथ्ये वर्ततां स्मृतः ।
सर्वार्थेषु रथी रक्ष्यस्त्वं चापि भृशपीडितः ॥ ३ ॥
'आयुष्मन्! मैंने तो सारथ्यमें तत्पर रहनेवाले लोगोंके इस उपदेशका स्मरण किया था कि सभी दशाओंमें रथीकी रक्षा करनी चाहिये। उस समय आप भी अधिक पीड़ित थे ॥ ३ ॥
त्वं हि शाल्वप्रयुक्तेन शरेणाभिहतो भृशम् ।
कश्मलाभिहतो वीर ततोऽहमपयातवान् ॥ ४ ॥
'वीर! शाल्वके चलाये हुए बाणोंसे अधिक घायल होनेके कारण आपको मूर्च्छा आ गयी थी, इसीलिये मैं आपको लेकर रणभूमिसे हटा था ॥ ४ ॥
स त्वं सात्वतमुख्याद्य लब्धसंज्ञो यदृच्छया ।
पश्य मे हयसंयाने शिक्षां केशवनन्दन ॥ ५ ॥
'सात्वतवीरोंमें प्रधान केशवनन्दन! अब दैवेच्छासे आप सचेत हो गये हैं, अतः घोड़े हाँकनेकी कलामें मुझे कैसी उत्तम शिक्षा मिली है, उसे देखिये ॥ ५ ॥
दारुकेणाहमुत्पन्नो यथावच्चैव शिक्षितः ।
वीतभीः प्रविशाम्येतां शाल्वस्य प्रथितां चमूम् ॥ ६ ॥
'मैं दारुकका पुत्र हूँ और उन्होंने ही मुझे सारथ्यकर्मकी यथावत् शिक्षा दी है। देखिये! अब मैं निर्भय होकर राजा शाल्वकी इस विख्यात सेनामें प्रवेश करता हूँ' ॥ ६ ॥
वासुदेव उवाच
एवमुक्त्वा ततो वीर हयान् संचोद्य संगरे ।
रश्मिभिस्तु समुद्यम्य जवेनाभ्यपतत् तदा ॥ ७ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**वीरवर! ऐसा कहकर उस सूतपुत्रने घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लेकर उन्हें युद्धभूमिकी ओर हाँका और शीघ्रतापूर्वक वहाँ जा पहुँचा ॥ ७ ॥
मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ।
सव्यानि च विचित्राणि दक्षिणानि च सर्वशः ॥ ८ ॥
उसने समान-असमान और वाम-दक्षिण आदि सब प्रकारकी विचित्र मण्डलाकार गतिसे रथका संचालन किया ॥ ८ ॥
प्रतोदेनाहता राजन् रश्मिभिश्च समुद्यताः ।
उत्पतन्त इवाकाशे व्यचरंस्ते हयोत्तमाः ॥ ९ ॥
राजन्! वे श्रेष्ठ घोड़े चाबुककी मार खाकर बागडोर हिलानेसे तीव्र गतिसे दौड़ने लगे, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ ९ ॥
ते हस्तलाघवोपेतं विज्ञाय नृप दारुकिम् ।
दह्यमाना इव तदा नास्पृशंश्चरणैर्महीम् ॥ १० ॥
महाराज! दारुकपुत्रके हस्तलाघवको समझकर वे घोड़े प्रज्वलित अग्निकी भाँति दमकते हुए इस प्रकार जा रहे थे, मानो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श भी न कर रहे हों ॥ १० ॥
सोऽपसव्यां चमूं तस्य शाल्वस्य भरतर्षभ ।
चकार नातियत्नेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११ ॥
भरतकुलभूषण! दारुकके पुत्रने अनायास ही शाल्वकी उस सेनाको अपसव्य (दाहिने) कर दिया। यह एक अद्भुत बात हुई ॥ ११ ॥
अमृष्यमाणोऽपसव्यं प्रद्युम्नेन च सौभराट् ।
यन्तारमस्य सहसा त्रिभिर्बाणैः समार्दयत् ॥ १२ ॥
सौभराज शाल्व प्रद्युम्नके द्वारा अपनी सेनाका अपसव्य किया जाना न सह सका। उसने सहसा तीन बाण चलाकर प्रद्युम्नके सारथिको घायल कर दिया ॥ १२ ॥
दारुकस्य सुतस्तत्र बाणवेगमचिन्तयन् ।
भूय एव महाबाहो प्रययावपसव्यतः ॥ १३ ॥
ततो बाणान् बहुविधान् पुनरेव स सौभराट् ।
मुमोच तनये वीर मम रुक्मिणिनन्दने ॥ १४ ॥
तानप्राप्ताञ्छितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा ।
रौक्मिणेयः स्मितं कृत्वा दर्शयन् हस्तलाघवम् ॥ १५ ॥
छिन्नान् दृष्ट्वा तु तान् बाणान् प्रद्युम्नेन च सौभराट् ।
आसुरीं दारुणीं मायामास्थाय व्यसृजच्छरान् ॥ १६ ॥
महाबाहो! परंतु दारुककुमारने वहाँ बाणोंके वेगपूर्वक प्रहारकी कोई चिन्ता न करते हुए शाल्वकी सेनाको अपसव्य (दाहिने) करते हुए ही रथको आगे बढ़ाया। वीरवर! तब सौभराज शाल्वने पुनः मेरे पुत्र रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नपर अनेक प्रकारके बाण चलाये। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शाल्वके बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही तीक्ष्ण बाणोंसे मुसकराकर काट देते थे। प्रद्युम्नके द्वारा अपने बाणोंको छिन्न-भिन्न होते देख सौभराजने भयंकर आसुरी मायाका सहारा लेकर बहुत-से बाण बरसाये ॥ १३—१६ ॥
प्रयुज्यमानमाज्ञाय दैतेयास्त्रं महाबलम् । ब्रह्मास्त्रेणान्तराच्छित्त्वा मुमोचान्यान् पतत्रिणः ॥ १७ ॥ प्रद्युम्नने शाल्वको अति शक्तिशाली दैत्यास्त्रका प्रयोग करता जानकर ब्रह्मास्त्रके द्वारा उसे बीचमें ही काट डाला और अन्य बहुत-से बाण बरसाये ॥ १७ ॥
ते तदस्त्रं विधूयाशु विव्यधु रुधिराशनाः । शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥ वे सभी बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाले थे। उन बाणोंने शाल्वके अस्त्रोंका नाश करके उसके मस्तक, छाती और मुखको बींध डाला, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १८ ॥
तस्मिन् निपतिते क्षुद्रे शाल्वे बाणप्रपीडिते । रौक्मिणेयो परं बाणं संदधे शत्रुनाशनम् ॥ १९ ॥ क्षुद्र स्वभाववाले राजा शाल्वके बाणविद्ध होकर गिर जानेपर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने अपने धनुषपर एक उत्तम बाणका संधान किया, जो शत्रुका नाश कर देनेवाला था ॥ १९ ॥
तमर्चितं सर्वदशार्हपूगै- राशीविषाग्निज्वलनप्रकाशम् । दृष्ट्वा शरं ज्यामभानीयमानं बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ॥ २० ॥ वह बाण समस्त यादवसमुदायके द्वारा सम्मानित, विषैले सर्पके समान विषाक्त तथा प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशमान था। उस बाणको प्रत्यंचापर रखा जाता हुआ देख अन्तरिक्षलोकमें हाहाकार मच गया ॥ २० ॥
ततो देवगणाः सर्वे सेन्द्राः सहधनेश्वराः । नारदं प्रेषयामासुः श्वसनं च मनोजवम् ॥ २१ ॥ तब इन्द्र और कुबेरसहित सम्पूर्ण देवताओंने देवर्षि नारद तथा मनके समान वेगवाले वायुदेवको भेजा ॥ २१ ॥
तौ रौक्मिणेयमागम्य वचोऽब्रूतां दिवौकसाम् ।
नैष वध्यस्त्वया वीर शाल्वराजः कथंचन ॥ २२ ॥
उन दोनोंने रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पास आकर देवताओंका यह संदेश सुनाया—‘वीरवर! यह राजा शाल्व युद्धमें कदापि तुम्हारा वध्य नहीं है’ ॥ २२ ॥
संहरस्व पुनर्बाणमवध्योऽयं त्वया रणे ।
एतस्य च शरस्याजौ नावध्योऽस्ति पुमान् क्वचित् ॥ २३ ॥
‘तुम अपने इस बाणको फिरसे लौटा लो; क्योंकि यह शाल्व तुम्हारे द्वारा अवध्य है। तुम्हारे इस बाणका प्रयोग होनेपर युद्धमें कोई भी पुरुष बिना मरे नहीं रह सकता ॥ २३ ॥
मृत्युरस्य महाबाहो रणे देवकिनन्दनः ।
कृष्णः संकल्पितो धात्रा तन्मिथ्या न भवेदिति ॥ २४ ॥
‘महाबाहो! विधाताने युद्धमें देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे ही इसकी मृत्यु निश्चित की है। उनका वह संकल्प मिथ्या नहीं होना चाहिये’ ॥ २४ ॥
ततः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् ।
संजहार धनुःश्रेष्ठात् तूणे चैव न्यवेशयत् ॥ २५ ॥
यह सुनकर प्रद्युम्न बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने श्रेष्ठ धनुषसे उस उत्तम बाणको उतार लिया और पुनः तरकसमें रख दिया ॥ २५ ॥
तत उत्थाय राजेन्द्र शाल्वः परमदुर्मनाः ।
व्यपायात् सबलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर शाल्व उठकर अत्यन्त दुःखितचित्त हो प्रद्युम्नके बाणोंसे पीड़ित होनेके कारण अपनी सेनाके साथ तुरंत भाग गया ॥ २६ ॥
स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरर्दितः ।
सौभमास्थाय राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ॥ २७ ॥
महाराज! उस समय वृष्णिवंशियोंसे पीड़ित हो क्रूर स्वभाववाला शाल्व द्वारकाको छोड़कर अपने सौभ नामक विमानका आश्रय ले आकाशमें जा पहुँचा ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 170)
विंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और शाल्वका भीषण युद्ध
वासुदेव उवाच
आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा ।
महाक्रतौ राजसूये निवृत्ते नृपते तव ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! आपका राजसूय महायज्ञ समाप्त होनेपर मैं शाल्वसे विमुक्त आनर्तनगर (द्वारका)-में गया ॥ १ ॥
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् ।
निःस्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम् ॥ २ ॥
महाराज! मैंने वहाँ पहुँचकर देखा, द्वारका श्रीहीन हो रही है। वहाँ न तो स्वाध्याय होता है, न वषट्कार। वह पुरी आभूषणोंसे रहित सुन्दरी नारीकी भाँति उदास लग रही थी ॥ २ ॥
अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि च ।
दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् ॥ ३ ॥
द्वारकाके वन-उपवन तो ऐसे हो रहे थे, मानो पहचाने ही न जाते हों। यह सब देखकर मेरे मनमें बड़ी शंका हुई और मैंने कृतवर्मासे पूछा— ॥ ३ ॥
अस्वस्थनरनारीकमिदं वृष्णिकुलं भृशम् ।
किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥
‘नरश्रेष्ठ! इस वृष्णिवंशके प्रायः सभी स्त्री-पुरुष अस्वस्थ दिखायी देते हैं, इसका क्या कारण है? यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तः स तु मया विस्तरेणेदमब्रवीत् ।
रोधं मोक्षं च शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ॥ ५ ॥
नृपश्रेष्ठ! मेरे इस प्रकार पूछनेपर कृतवर्माने शाल्वके द्वारकापुरीपर घेरा डालने और फिर छोड़कर भाग जानेका सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया ॥ ५ ॥
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ श्रुत्वा सर्वमशेषतः ।
विनाशे शाल्वराजस्य तदैवाकरवं मतिम् ॥ ६ ॥
भरतवंशशिरोमणे! यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मैंने शाल्वराजके विनाशका पूर्ण निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् ।
राजानमाहुकं चैव तथैवानकदुन्दुभिम् ॥ ७ ॥
सर्वान् वृष्णिप्रवीरांश्च हर्षयन्नब्रुवं तदा ।
अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैं नगरनिवासियोंको आश्वासन देकर राजा उग्रसेन, पिता वसुदेव तथा सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बोला—'यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषो! आपलोग नगरकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहें' ॥ ७-८ ॥
शाल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निबोधत ।
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति ॥ ९ ॥
'मैं शाल्वराजका नाश करनेके लिये यहाँसे प्रस्थान करता हूँ। आप यह निश्चय जानें; मैं शाल्वका वध किये बिना द्वारकापुरीको नहीं लौटूँगा' ॥ ९ ॥
सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः ।
त्रिःसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणा ॥ १० ॥
'शाल्वसहित सौभनगरका नाश कर लेनेपर ही मैं पुनः आपलोगोंका दर्शन करूँगा। अब शत्रुओंको भयभीत करनेवाले इस नगाड़ेको तीन बार बजाइये' ॥ १० ॥
ते मयाऽऽश्वासिता वीरा यथावद् भरतर्षभ ।
सर्वे मामब्रुवन् हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥ ११ ॥
भरतकुलभूषण! मेरे इस प्रकार आश्वासन देनेपर सभी यदुवंशी वीरोंने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'जाइये और शत्रुओंका विनाश कीजिये' ॥ ११ ॥
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः ।
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान् प्रणम्य शिरसाभवम् ॥ १२ ॥
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन् दिशः ।
प्रध्माय शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप ॥ १३ ॥
प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः ।
क्लृप्तेन चतुरङ्गेन यत्तेन जितकाशिना ॥ १४ ॥
प्रसन्नचित्तवाले उन वीरोंके द्वारा आशीर्वादसे अभिनन्दित होकर मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बजाकर मैंने विशाल सेनाके साथ रणके लिये प्रस्थान किया। मेरी उस व्यूहरचनासे युक्त और नियन्त्रित सेनामें हाथी, घोड़े, रथी और पैदल—चारों ही अंग मौजूद थे। उस समय वह सेना विजयसे सुशोभित हो रही थी ॥ १२—१४ ॥
समतीत्य बहून् देशान् गिरींश्च बहुपादपान् ।
सरांसि सरितश्चैव मार्तिकावतमासदम् ॥ १५ ॥
तब मैं बहुत-से देशों और असंख्य वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतों, सरोवरों और सरिताओंको लाँघता हुआ मार्तिकावतमें जा पहुँचा ॥ १५ ॥
तत्राश्रौषं नरव्याघ्र शाल्वं सागरमन्तिकात् । प्रयान्तं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वयाम् ॥ १६ ॥ नरव्याघ्र! वहाँ मैंने सुना कि शाल्व सौभविमानपर बैठकर समुद्रके निकट जा रहा है। तब मैं उसीके पीछे लग गया ॥ १६ ॥
ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः । समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत् सौभमास्थाय शत्रुहन् ॥ १७ ॥ शत्रुनाशन! फिर समुद्रके निकट पहुँचकर उत्ताल तरंगोंवाले महासागरकी कुक्षिके अन्तर्गत उसके नाभिदेश (एक द्वीप)-में जाकर राजा शाल्व सौभविमानपर ठहरा हुआ था ॥ १७ ॥
स समालोक्य दूरान्मां स्मयन्निव युधिष्ठिर । आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥ युधिष्ठिर! वह दुष्टात्मा दूरसे ही मुझे देखकर मुसकराता हुआ-सा बारंबार युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ १८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः । पुंर नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ॥ १९ ॥ मेरे शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बहुत-से मर्मभेदी बाण शाल्वके विमानतक नहीं पहुँच सके। इससे मैं रोषमें भर गया ॥ १९ ॥
स चापि पापप्रकृतिर्दैतेयापसदो नृप । मय्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ॥ २० ॥ राजन्! नीच दैत्य दुर्धर्ष राजा शाल्व स्वभावसे ही पापाचारी था। उसने मेरे ऊपर सहस्रों बाणधाराएँ बरसायीं ॥ २० ॥
सैनिकान् मम सूतं च हयांश्च समवाकिरत् । अचिन्तयन्तस्तु शरान् वयं युध्याम भारत ॥ २१ ॥ मेरे सारथि, घोड़ों तथा सैनिकोंपर उसने भी बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! उसके बाणोंकी बौछारको कुछ न समझकर मैं युद्धमें ही लगा रहा ॥ २१ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् । चिक्षिपुः समरे वीरा मयि शाल्वपदानुगाः ॥ २२ ॥ तदनन्तर शाल्वके अनुगामी वीरोंने युद्धमें मेरे ऊपर झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाण बरसाये ॥ २२ ॥
ते हयांश्च रथं चैव तदा दारुकमेव च । छादयामासुरासुरास्तैर्बाणैर्मर्मभेदिभिः ॥ २३ ॥ उस समय उन असुरोंने अपने मर्मवेधी बाणोंद्वारा मेरे घोड़ोंको, रथको और दारुकको भी ढक दिया ॥ २३ ॥
न हया न रथो वीर न यन्ता मम दारुकः ।
अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाहं सैनिकाश्च मे ॥ २४ ॥
वीरवर! उस समय मेरे घोड़े, रथ, मेरा सारथि दारुक, मैं तथा मेरे सारे सैनिक—सभी बाणोंसे आच्छादित होकर अदृश्य हो गये ॥ २४ ॥
ततोऽहमपि कौन्तेय शराणामयुतान् बहून् ।
आमन्त्रितानां धनुषा दिव्येन विधिनाक्षिपम् ॥ २५ ॥
कुन्तीनन्दन! तब मैंने भी अपने धनुषद्वारा दिव्य विधिसे अभिमन्त्रित किये हुए कई हजार बाण बरसाये ॥ २५ ॥
न तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत ।
खे विषक्तं हि तत् सौभं क्रोशमात्र इवाभवत् ॥ २६ ॥
भारत! शाल्वका सौभविमान आकाशमें इस प्रकार प्रवेश कर गया था कि मेरे सैनिकोंकी दृष्टिमें आता ही नहीं था, मानो एक कोस दूर चला गया हो ॥ २६ ॥
ततस्ते प्रेक्षकाः सर्वे रङ्गवाद इव स्थिताः ।
हर्षयामासुरुच्चैर्मां सिंहनादतलस्वनैः ॥ २७ ॥
तब वे सैनिक रंगशालामें बैठे हुए दर्शकोंकी भाँति केवल मेरे युद्धका दृश्य देखते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद और करतलध्वनि करके मेरा हर्ष बढ़ाने लगे ॥ २७ ॥
मत्कराग्रविनिर्मुक्ता दानवानां शरास्तथा ।
अङ्गेषु रुचिरापाङ्गा विविशुः शलभा इव ॥ २८ ॥
तब मेरे हाथोंसे छूटे हुए मनोहर पंखवाले बाण दानवोंके अंगोंमें शलभोंकी भाँति घुसने लगे ॥ २८ ॥
ततो हलहलाशब्दः सौभमध्ये व्यवर्धत ।
वध्यतां विशिखैस्तीक्ष्णैः पततां च महार्णवे ॥ २९ ॥
इससे सौभविमानमें मेरे तीखे बाणोंसे मरकर महासागरमें गिरनेवाले दानवोंका कोलाहल बढ़ने लगा ॥ २९ ॥
ते निकृत्तभुजस्कन्धाः कबन्धाकृतिदर्शनाः ।
नदन्तो भैरवान् नादान् निपतन्ति स्म दानवाः ॥ ३० ॥
कंधे और भुजाओंके कट जानेसे कबन्धकी आकृतिमें दिखायी देनेवाले वे दानव भयंकर नाद करते हुए समुद्रमें गिरने लगे ॥ ३० ॥
पतितास्तेऽपि भक्ष्यन्ते समुद्रांभोनिवासिभिः ।
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् ॥ ३१ ॥
जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरयम् ।
तान् दृष्ट्वा पतितांस्तत्र शाल्वः सौभपतिस्ततः ॥ ३२ ॥
मायायुद्धेन महता योधयामास मां युधि ।
ततो गदा हलाः प्रासाः शूलशक्तिपरश्वधाः ॥ ३३ ॥ अस्यः शक्तिकुलिशपाशर्ष्टिकनपाः शराः । पट्टिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रपतन्त्यनिशं मयि ॥ ३४ ॥ जो गिरते थे, उन्हें समुद्रमें रहनेवाले जीव-जन्तु निगल जाते थे। तत्पश्चात् मैंने गोदुग्ध, कुन्दपुष्प, चन्द्रमा, मृणाल तथा चाँदीकी-सी कान्तिवाले पांचजन्य नामक शंखको बड़े जोरसे फूँका। उन दानवोंको समुद्रमें गिरते देख सौभराज शाल्व महान् मायायुद्धके द्वारा मेरा सामना करने लगा। फिर तो मेरे ऊपर गदा, हल, प्रास, शूल, शक्ति, फरसे, खड्ग, शक्ति, वज्र, पाश, ऋष्टि, कनप, बाण, पट्टिश और भुशुण्डी आदि शस्त्रास्त्रोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी ॥ ३१—३४ ॥
तामहं माययैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् । तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत् ॥ ३५ ॥ शाल्वकी उस मायाको मैंने मायाद्वारा ही नियन्त्रित करके नष्ट कर दिया। उस मायाका नाश होनेपर वह पर्वतके शिखरोंद्वारा युद्ध करने लगा ॥ ३५ ॥
ततोऽभवत् तम इव प्रकाश इव चाभवत् । दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतोष्णं च भारत ॥ ३६ ॥ अङ्गारपांशुवर्षं च शस्त्रवर्षं च भारत । एवं मायां प्रकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः ॥ ३७ ॥ तदनन्तर कभी अन्धकार-सा हो जाता, कभी प्रकाश-सा हो जाता, कभी मेघोंसे आकाश घिर जाता और कभी बादलोंके छिन्न-भिन्न होनेसे सुन्दर दिन प्रकट हो जाता था। कभी सर्दी और कभी गरमी पड़ने लगती थी। अंगार और धूलिकी वर्षाके साथ-साथ शस्त्रोंकी भी वृष्टि होने लगती। इस प्रकार शत्रुने मेरे साथ मायाका प्रयोग करते हुए युद्ध आरम्भ किया ॥ ३६—३७ ॥
विज्ञाय तदहं सर्वं माययैव व्यनाशयम् । यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः ॥ ३८ ॥ वह सब जानकर मैंने मायाद्वारा ही उसकी मायाका नाश कर दिया। यथासमय युद्ध करते हुए मैंने बाणोंद्वारा शाल्वकी सेनाको सब ओरसे संतप्त कर दिया ॥ ३८ ॥
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् । शतचन्द्रं च कौन्तेय सहस्रायुततारकम् ॥ ३९ ॥ कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर! इसके बाद आकाश सौ सूर्योंसे उद्भासित-सा दिखायी देने लगा। उसमें सैकड़ों चन्द्रमा और करोड़ों तारे दिखायी देने लगे ॥ ३९ ॥
ततो नाज्ञायत तदा दिवारात्रं तथा दिशः । ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ॥ ४० ॥
उस समय यह नहीं जान पड़ता था कि यह दिन है या रात्रि! दिशाओंका भी ज्ञान नहीं होता था; इससे मोहित होकर मैंने प्रज्ञास्त्रका संधान किया ।। ४० ।। ततस्तदस्त्रं कौन्तेय धूतं तूलमिवानिलैः । तथा तदभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । लब्धालोकस्तु राजेन्द्र पुनः शत्रुमयोधयम् ।। ४१ ।। कुन्तीकुमार! तब उस अस्त्रने उस सारी मायाको उसी प्रकार उड़ा दिया, जैसे हवा रूईको उड़ा देती है। इसके बाद शाल्वके साथ हमलोगोंका अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा। राजेन्द्र! सब ओर प्रकाश हो जानेपर मैंने पुनः शत्रुसे युद्ध प्रारम्भ कर दिया ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २० ।।
अध्याय (पृष्ठ 176)
एकविंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुनः सजग होना
वासुदेव उवाच
एवं स पुरुषव्याघ्र शाल्वराजो महारिपुः । युध्यमानो मया संख्ये वियदभ्यगमत् पुनः ॥ १ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**पुरुषसिंह! इस प्रकार मेरे साथ युद्ध करनेवाला महाशत्रु शाल्वराज पुनः आकाशमें चला गया ॥ १ ॥
ततः शतघ्नीश्च महागदाश्च दीप्तांश्च शूलान् मुसलानसींश्च । चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धिः शाल्वो महाराज जयाभिकाङ्क्षी ॥ २ ॥ महाराज! वहाँसे विजयकी इच्छा रखनेवाले मन्दबुद्धि शाल्वने क्रोधमें भरकर मेरे ऊपर शतघ्नियां, बड़ी-बड़ी गदाएँ, प्रज्वलित शूल, मुसल और खड्ग फेंके ॥ २ ॥
तानाशुगैरापततोऽहमाशु निवार्य हन्तुं खगमान् ख एव । द्विधा त्रिधा चाच्छिदमाशुमुक्तै- स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो बभूव ॥ ३ ॥ उनके आते ही मैंने तुरंत शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उन्हें रोककर उन गगनचारी शत्रुओंको आकाशमें ही मार डालनेका निश्चय किया और शीघ्र छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबके दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर डाले। इससे अन्तरिक्षमें बड़ा भारी आर्त्तनाद हुआ ॥ ३ ॥
ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् । दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ॥ ४ ॥ तदनन्तर शाल्वने झुकी हुई गाँठोंवाले लाखों बाणोंका प्रहार करके मेरे सारथि दारुक, घोड़ों तथा रथको आच्छादित कर दिया ॥ ४ ॥
ततो मामब्रवीद् वीर दारुको विह्वलन्निव । स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्वबाणप्रपीडितः । अवस्थातुं न शक्नोमि अङ्गं मे व्यवसीदति ॥ ५ ॥ वीरवर! तब दारुक व्याकुल-सा होकर मुझसे बोला—'प्रभो! युद्धमें डटे रहना चाहिये' इस कर्तव्यका स्मरण करके ही मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ; किंतु शाल्वके बाणोंसे अत्यन्त
पीड़ित होनेके कारण मुझमें खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी है। मेरा अंग शिथिल होता जा रहा है' ॥ ५ ॥ इति तस्य निशम्याहं सारथेः करुणं वचः । अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम् ॥ ६ ॥ सारथिका यह करुण वचन सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। उसे बाणोंद्वारा बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ६ ॥ न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये । अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरैः ॥ ७ ॥ स तु बाणवरोत्पीडाद् विस्रवत्यसृगुल्बणम् । अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिर्गैरिकधातुमान् ॥ ८ ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! उसकी छातीमें, मस्तकपर, शरीरके अन्य अवयवोंमें तथा दोनों भुजाओंमें थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं दिखायी देता था, जिसमें बाण न चुभे हुए हों। जैसे मेघके वर्षा करनेपर गेरू आदि धातुओंसे युक्त पर्वत लाल पानीकी धारा बहाने लगता है, वैसे ही वह बाणोंसे छिदे हुए अपने अंगोंसे भयंकर रक्तकी धारा बहा रहा था ॥ ७-८ ॥ अभीषु हस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे । अस्तम्भयं महाबाहो शाल्वबाणप्रपीडितम् ॥ ९ ॥ महाबाहो! उस युद्धमें हाथमें बागडोर लिये सारथिको शाल्वके बाणोंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते देख मैंने उसे ढाढ़स बँधाया ॥ ९ ॥ अथ मां पुरुषः कश्चिद् द्वारकानिलयोऽब्रवीत् । त्वरितो रथमभ्येत्य सौहृदादिव भारत ॥ १० ॥ आहुकस्य वचो वीर तस्यैव परिचारकः । विषण्णः सन्नकण्ठेन तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ११ ॥ भरतवंशी वीरवर! इतनेमें ही कोई द्वारकावासी पुरुष आकर तुरंत मेरे रथपर चढ़ गया और सौहार्द दिखाता हुआ-सा बोला। वह राजा उग्रसेनका सेवक था और दुःखी होकर उसने गद्गदकण्ठसे उनका जो संदेश सुनाया, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ १०-११ ॥ द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः । केशवैहि विजानीष्व यत् त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥ (दूत बोला—) 'वीर! द्वारकानरेश उग्रसेनने आपको यह एक संदेश दिया है। केशव! वे आपके पिताके सखा हैं; उन्होंने आपसे कहा है कि यहाँ आ जाओ और जान लो ॥ १२ ॥ उपायायाद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन । विषक्ते त्वयि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो बलात् ॥ १३ ॥
'दुर्धर्ष वृष्णिनन्दन! आपके युद्धमें आसक्त होनेपर शाल्वने अभी द्वारकापुरीमें आकर शूरनन्दन वसुदेवजीको बलपूर्वक मार डाला है ।। १३ ।। तदलं साधु युद्धेन निवर्तस्व जनार्दन । द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत् तव ।। १४ ।। 'जनार्दन! अब युद्ध करके क्या लेना है? लौट आओ। द्वारकाकी ही रक्षा करो। तुम्हारे लिये यही सबसे महान् कार्य है' ।। १४ ।। इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः । निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ।। १५ ।। दूतका यह वचन सुनकर मेरा मन उदास हो गया। मैं कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाता था ।। १५ ।। सात्यकिं बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् । जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम् ।। १६ ।। वीर युधिष्ठिर! वह महान् अप्रिय वृत्तान्त सुनकर मैं मन-ही-मन सात्यकि, बलरामजी तथा महारथी प्रद्युम्नकी निन्दा करने लगा ।। १६ ।। अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन । तेषु रक्षां समाधाय प्रयातः सौभपातने ।। १७ ।। कुरुनन्दन! मैं द्वारका तथा पिताजीकी रक्षाका भार उन्हीं लोगोंपर रखकर सौभविमानका नाश करनेके लिये चला था ।। १७ ।। बलदेवो महाबाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा । सात्यकी रौक्मिणेयश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् ।। १८ ।। साम्बप्रभृतयश्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः । एतेषु हि नरव्याघ्र जीवत्सु न कथंचन ।। १९ ।। शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वयम् । हतः शूरसुतो व्यक्तं व्यक्तं चैते परासवः ।। २० ।। बलदेवमुखाः सर्व इति मे निश्चिता मतिः । सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तयानो मुहुर्मुहुः । अविह्वलो महाराज पुनः शाल्वमयोधयम् ।। २१ ।। क्या शत्रुहन्ता महाबली बलरामजी जीवित हैं? क्या सात्यकि, रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, महाबली चारुदेष्ण तथा साम्ब आदि जीवन धारण करते हैं? इन बातोंका विचार करते-करते मेरा मन बहुत उदास हो गया। नरश्रेष्ठ! इन वीरोंके जीते-जी साक्षात् इन्द्र भी मेरे पिता वसुदेवजीको किसी प्रकार मार नहीं सकते थे। अवश्य ही शूरनन्दन वसुदेवजी मारे गये और यह भी स्पष्ट है कि बलरामजी आदि सभी प्रमुख वीर प्राणत्याग कर चुके हैं—यह मेरा
निश्चित विचार हो गया। महाराज! इस प्रकार सबके विनाशका बारंबार चिन्तन करके भी मैं व्याकुल न होकर राजा शाल्वसे पुनः युद्ध करने लगा ।। १८-२१ ।। ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा । सौभाच्छूरसुतं वीर ततो मां मोह आविशत् ।। २२ ।। वीर महाराज! इसी समय मैंने देखा, सौभविमानसे मेरे पिता वसुदेवजी नीचे गिर रहे हैं। इससे शाल्वकी मायासे मुझे मूर्च्छा-सी आ गयी ।। २२ ।। तस्य रूपं प्रपतः पितुर्मम नराधिप । ययातेः क्षीणपुण्यस्य स्वर्गादिव महीतलम् ।। २३ ।। नरेश्वर! उस विमानसे गिरते हुए मेरे पिताका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो पुण्यक्षय होनेपर स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरनेवाले राजा ययातिका शरीर हो ।। २३ ।। विशीर्णमलिनोष्णीषः प्रकीर्णाम्बरमूर्धजः । प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।। २४ ।। उनकी मलिन पगड़ी बिखर गयी थी, शरीरके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे और बाल बिखर गये थे। वे गिरते समय पुण्यहीन ग्रहकी भाँति दिखायी देते थे ।। २४ ।। ततः शार्ङ्गं धनुःश्रेष्ठं करात् प्रपतितं मम । मोहापन्नश्च कौन्तेय रथोपस्थ उपाविशम् ।। २५ ।। कुन्तीनन्दन! उनकी यह अवस्था देख धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग मेरे हाथसे छूटकर गिर गया और मैं शाल्वकी मायासे मोहित-सा होकर रथके पिछले भागमें चुपचाप बैठ गया ।। २५ ।। ततो हाहाकृतं सर्वं सैन्यं मे गतचेतनम् । मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ।। २६ ।। भारत! फिर तो मुझे रथके पिछले भागमें प्राणरहितके समान पड़ा देख मेरी सारी सेना हाहाकार कर उठी। सबकी चेतना लुप्त-सी हो गयी ।। २६ ।। प्रसार्य बाहू पततः प्रसार्य चरणावपि । रूपं पितुर्मे विबभौ शकुनेः पततो यथा ।। २७ ।। हाथों और पैरोंको फैलाकर गिरते हुए मेरे पिताका शरीर मरकर गिरनेवाले पक्षीके समान जान पड़ता था ।। २७ ।। तं पतन्तं महाबाहो शूलपट्टिशपाणयः । अभिघ्नन्तो भृशं वीर मम चेतो ह्यकम्पयन् ।। २८ ।। वीरवर महाबाहो! गिरते समय शत्रु-सैनिक हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये उनके ऊपर बारंबार प्रहार कर रहे थे। उनके इस क्रूर कृत्यने मेरे हृदयको कम्पित-सा कर दिया ।। २८ ।। ततो मुहूर्तात् प्रतिलभ्य संज्ञा- महं तदा वीर महाविमर्दे ।
न तत्र सौभं न रिपुं च शाल्वं पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि ॥ २९ ॥ वीरवर! तदनन्तर दो घड़ीके बाद जब मैं सचेत होकर देखता हूँ, तब उस महासमरमें न तो सौभविमानका पता है, न मेरा शत्रु शाल्व ही दिखायी देता है और न मेरे बूढ़े पिता ही दृष्टिगोचर होते हैं ॥ २९ ॥
ततो ममासीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम् । प्रबुद्धोऽस्मि ततो भूयः शतशोऽवाकिरं शरान् ॥ ३० ॥ तब मेरे मनमें यह निश्चय हो गया कि यह वास्तवमें माया ही थी। तब मैंने सजग होकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 181)
द्वाविंशोऽध्यायः
शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान
वासुदेव उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः ।
शरैरपातयं सौभाच्छिरांसि विबुधद्विषाम् ॥ १ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तब मैं अपना सुन्दर धनुष उठाकर बाणोंद्वारा सौभविमानसे देवद्रोही दानवोंके मस्तक काट-काटकर गिराने लगा ॥ १ ॥
शरांश्चाशीविषाकारानूर्ध्वगांस्तिग्मतेजसः ।
प्रैषयं शाल्वराजाय शार्ङ्गमुक्तान् सुवाससः ॥ २ ॥
तत्पश्चात् शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोंके समान प्रतीत होनेवाले, सुन्दर पंखोंसे सुशोभित, प्रचण्ड तेजस्वी तथा अनेक ऊर्ध्वगामी बाण मैंने राजा शाल्वपर चलाये ॥ २ ॥
ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह ।
अन्तर्हितं माययाभूत् ततोऽहं विस्मितोऽभवम् ॥ ३ ॥
कुरुकुलशिरोमणे! परंतु उस समय सौभविमान मायासे अदृश्य हो गया, अतः किसी प्रकार दिखायी नहीं देता था। इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३ ॥
अथ दानवसङ्घास्ते विकृताननमूर्धजाः ।
उदक्रोशन् महाराज विष्ठिते मयि भारत ॥ ४ ॥
भरतवंशी महाराज! तदनन्तर जब मैं निर्भय और अचलभावसे स्थित हुआ तथा उनपर शस्त्रप्रहार करने लगा, तब विकृत मुख और केशवाले सौभनिवासी दानवगण जोर-जोरसे चिल्लाने लगे ॥ ४ ॥
ततोऽस्त्रं शब्दसाहं वै त्वरमाणो महारणे ।
अयोजयं तद्वधाय ततः शब्द उपारमत् ॥ ५ ॥
तब मैंने उनके वधके लिये उस महान् संग्राममें बड़ी उतावलीके साथ शब्दवेधी बाणका संधान किया। यह देख उनका कोलाहल शान्त हो गया ॥ ५ ॥
हतास्ते दानवाः सर्वे यैः स शब्द उदीरितः ।
शरैरादित्यसंकाशैर्ज्वलितैः शब्दसाधनैः ॥ ६ ॥
जिन दानवोंने पहले कोलाहल किया था, वे सब सूर्यके समान तेजस्वी शब्दवेधी बाणोंद्वारा मारे गये ॥ ६ ॥