भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

महाबाहो! परंतु दारुककुमारने वहाँ बाणोंके वेगपूर्वक प्रहारकी कोई चिन्ता न करते हुए शाल्वकी सेनाको अपसव्य (दाहिने) करते हुए ही रथको आगे बढ़ाया। वीरवर! तब सौभराज शाल्वने पुनः मेरे पुत्र रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नपर अनेक प्रकारके बाण चलाये। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शाल्वके बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही तीक्ष्ण बाणोंसे मुसकराकर काट देते थे। प्रद्युम्नके द्वारा अपने बाणोंको छिन्न-भिन्न होते देख सौभराजने भयंकर आसुरी मायाका सहारा लेकर बहुत-से बाण बरसाये ॥ १३—१६ ॥

प्रयुज्यमानमाज्ञाय दैतेयास्त्रं महाबलम् । ब्रह्मास्त्रेणान्तराच्छित्त्वा मुमोचान्यान् पतत्रिणः ॥ १७ ॥ प्रद्युम्नने शाल्वको अति शक्तिशाली दैत्यास्त्रका प्रयोग करता जानकर ब्रह्मास्त्रके द्वारा उसे बीचमें ही काट डाला और अन्य बहुत-से बाण बरसाये ॥ १७ ॥

ते तदस्त्रं विधूयाशु विव्यधु रुधिराशनाः । शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥ वे सभी बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाले थे। उन बाणोंने शाल्वके अस्त्रोंका नाश करके उसके मस्तक, छाती और मुखको बींध डाला, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १८ ॥

तस्मिन् निपतिते क्षुद्रे शाल्वे बाणप्रपीडिते । रौक्मिणेयो परं बाणं संदधे शत्रुनाशनम् ॥ १९ ॥ क्षुद्र स्वभाववाले राजा शाल्वके बाणविद्ध होकर गिर जानेपर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने अपने धनुषपर एक उत्तम बाणका संधान किया, जो शत्रुका नाश कर देनेवाला था ॥ १९ ॥

तमर्चितं सर्वदशार्हपूगै- राशीविषाग्निज्वलनप्रकाशम् । दृष्ट्वा शरं ज्यामभानीयमानं बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ॥ २० ॥ वह बाण समस्त यादवसमुदायके द्वारा सम्मानित, विषैले सर्पके समान विषाक्त तथा प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशमान था। उस बाणको प्रत्यंचापर रखा जाता हुआ देख अन्तरिक्षलोकमें हाहाकार मच गया ॥ २० ॥

ततो देवगणाः सर्वे सेन्द्राः सहधनेश्वराः । नारदं प्रेषयामासुः श्वसनं च मनोजवम् ॥ २१ ॥ तब इन्द्र और कुबेरसहित सम्पूर्ण देवताओंने देवर्षि नारद तथा मनके समान वेगवाले वायुदेवको भेजा ॥ २१ ॥

तौ रौक्मिणेयमागम्य वचोऽब्रूतां दिवौकसाम् ।