महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैष वध्यस्त्वया वीर शाल्वराजः कथंचन ॥ २२ ॥
उन दोनोंने रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पास आकर देवताओंका यह संदेश सुनाया—‘वीरवर! यह राजा शाल्व युद्धमें कदापि तुम्हारा वध्य नहीं है’ ॥ २२ ॥
संहरस्व पुनर्बाणमवध्योऽयं त्वया रणे ।
एतस्य च शरस्याजौ नावध्योऽस्ति पुमान् क्वचित् ॥ २३ ॥
‘तुम अपने इस बाणको फिरसे लौटा लो; क्योंकि यह शाल्व तुम्हारे द्वारा अवध्य है। तुम्हारे इस बाणका प्रयोग होनेपर युद्धमें कोई भी पुरुष बिना मरे नहीं रह सकता ॥ २३ ॥
मृत्युरस्य महाबाहो रणे देवकिनन्दनः ।
कृष्णः संकल्पितो धात्रा तन्मिथ्या न भवेदिति ॥ २४ ॥
‘महाबाहो! विधाताने युद्धमें देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे ही इसकी मृत्यु निश्चित की है। उनका वह संकल्प मिथ्या नहीं होना चाहिये’ ॥ २४ ॥
ततः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् ।
संजहार धनुःश्रेष्ठात् तूणे चैव न्यवेशयत् ॥ २५ ॥
यह सुनकर प्रद्युम्न बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने श्रेष्ठ धनुषसे उस उत्तम बाणको उतार लिया और पुनः तरकसमें रख दिया ॥ २५ ॥
तत उत्थाय राजेन्द्र शाल्वः परमदुर्मनाः ।
व्यपायात् सबलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर शाल्व उठकर अत्यन्त दुःखितचित्त हो प्रद्युम्नके बाणोंसे पीड़ित होनेके कारण अपनी सेनाके साथ तुरंत भाग गया ॥ २६ ॥
स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरर्दितः ।
सौभमास्थाय राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ॥ २७ ॥
महाराज! उस समय वृष्णिवंशियोंसे पीड़ित हो क्रूर स्वभाववाला शाल्व द्वारकाको छोड़कर अपने सौभ नामक विमानका आश्रय ले आकाशमें जा पहुँचा ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥