महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1631, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जुएका अवसर उपस्थित होनेपर विदुरजीने मुझसे, तुमसे तथा (मामा) शकुनिसे जैसी बातें कही थीं, उन्हें तो तुम जानते ही हो ।। ६ ।। तानि सर्वाणि वाक्यानि यच्चान्यत् परिदेवितम् । विचिन्त्य नाधिगच्छामि गमनायेतराय वा ।। ७ ।। ‘उन सब बातोंपर तथा और भी पाण्डवोंके लिये जो विलाप किया गया है, उसपर विचार करके मैं किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता कि द्वैतवनमें चलूँ या न चलूँ ।। ममापि हि महान् हर्षो यदहं भीमफाल्गुनौ । क्लिश्यावरण्ये पश्येयं कृष्णया सहिताविति ।। ८ ।। ‘यदि मैं भीमसेन तथा अर्जुनको द्रौपदीके साथ वनमें क्लेश उठाते देख सकूँ, तो मुझे भी बड़ी प्रसन्नता होगी ।। ८ ।। न तथा ह्याप्नुयां प्रीतिमवाप्य वसुधामिमाम् । दृष्ट्वा यथा पाण्डुसुतान् वल्कलाजिनवाससः ।। ९ ।। ‘पाण्डवोंको वल्कल वस्त्र पहने और मृगचर्म ओढ़े देखकर मुझे जितनी खुशी होगी, उतनी इस समूची पृथ्वीका राज्य पाकर भी नहीं होगी’ ।। ९ ।। किं नु स्यादधिकं तस्माद् यदहं द्रुपदात्मजाम् । द्रौपदीं कर्ण पश्येयं काषायवसनां वने ।। १० ।। ‘कर्ण! मैं द्रुपदकुमारी कृष्णाको वनमें गेरुए कपड़े पहने देखूँ, इससे बढ़कर प्रसन्नताकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है? ।। १० ।। यदि मां धर्मराजश्च भीमसेनश्च पाण्डवः । युक्तं परमया लक्ष्म्या पश्येतां जीवितं भवेत् ।। ११ ।। ‘यदि धर्मराज युधिष्ठिर तथा पाण्डुनन्दन भीमसेन मुझे परमोत्कृष्ट राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देख लें तो मेरा जीवन सफल हो जाय ।। ११ ।। उपायं न तु पश्यामि येन गच्छेम तद् वनम् । यथा चाभ्यनुजानीयाद् गच्छन्तं मां महीपतिः ।। १२ ।। ‘परन्तु मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे हमलोग द्वैतवनमें जा सकें; अथवा महाराज मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दें’ ।। १२ ।। स सौबलेन सहितस्तथा दुःशासनेन च । उपायं पश्य निपुणं येन गच्छेम तद् वनम् ।। १३ ।। ‘अतः तुम मामा शकुनि तथा भाई दुःशासनके साथ सलाह करके कोई अच्छा-सा उपाय ढूँढ़ निकालो, जिससे हमलोग द्वैतवनमें चल सकें ।। १३ ।। अहमप्यद्य निश्चित्य गमनायेतराय च । कल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ।। १४ ।।