भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1632, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1632

‘मैं भी आज ही जाने या न जानेके विषयमें कोई निश्चय करके कल सबेरा होते ही महाराजके पास जाऊँगा।। मयि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे। उपायो यो भवेद् दृष्टस्तं ब्रूयाः सहसौबलः।। १५ ।। ‘जब मैं वहाँ बैठ जाऊँ और कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी भी उपस्थित रहें, उस समय जो उपाय दिखायी दे, उसे तुम और शकुनि—दोनों बतलाना।। १५ ।। वचो भीष्मस्य राज्ञश्च निशम्य गमनं प्रति। व्यवसायं करिष्येऽहमनुनीय पितामहम्।। १६ ।। ‘पितामह भीष्मजीकी तथा महाराजकी वहाँ जानेके विषयमें क्या सम्मति है; यह सुन लेनेपर पितामहको अनुनय-विनयसे राजी करके (उनकी आज्ञा लेकर ही) द्वैतवनमें चलनेका निश्चय करूँगा’।। १६ ।। तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे जग्मुरावसथान् प्रति। व्युषितायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ।। १७ ।। ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही हो’ यह कहकर सब अपने-अपने विश्रामगृहमें चले गये। जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब कर्ण राजा दुर्योधनके पास गया।। १७ ।। ततो दुर्योधनं कर्णः प्रहसन्निदमब्रवीत्। उपायः परिदृष्टोऽयं तं निबोध जनेश्वर।। १८ ।। वहाँ कर्णने हँसकर दुर्योधनसे कहा—‘जनेश्वर! मुझे जो उपाय सूझा है, उसे बताता हूँ, सुनो।। १८ ।। घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप। घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ।। १९ ।। ‘नरेश्वर! गौओंके रहनेके सभी स्थान इस समय द्वैतवनमें ही हैं और वहाँ आपके पधारनेकी सदा प्रतीक्षा की जाती है, अतः घोषयात्रा (उन स्थानोंको देखने)-के बहाने हम वहाँ निःसन्देह चल सकेंगे।। १९ ।। उचितं हि सदा गन्तुं घोषयात्रां विशाम्पते। एवं च त्वां पिता राजन् समनुज्ञातुमर्हति ।। २० ।। ‘राजन्! अपनी गौओंको देखनेके लिये यात्रा करना सदा उचित ही है; ऐसा बहाना लेनेपर पिताजी तुम्हें अवश्य वहाँ जानेकी आज्ञा दे सकते हैं’।। २० ।। तथा कथयमानौ तौ घोषयात्राविनिश्चयम्। गान्धारराजः शकुनिः प्रत्युवाच हसन्निव ।। २१ ।। घोषयात्राका निश्चय करनेके लिये इस प्रकारकी बातें करते हुए उन दोनों सुहृदोंसे गान्धारराज शकुनिने हँसते हुए-से कहा—।। २१ ।। उपायोऽयं मया दृष्टो गमनाय निरामयः।