भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1636, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1636

अतो नाभ्यनुजानामि गमनं तत्र वः स्वयम् ।। ७ ।। मैंने सुना है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव भी इन दिनों वहीं कहीं आस-पास ठहरे हुए हैं; अतः तुमलोगोंको मैं स्वयं वहाँ जानेकी आज्ञा नहीं दे सकता ।। ७ ।।

छद्मना निर्जितास्ते तु कर्शिताश्च महावने । तपोनित्याश्च राधेय समर्थाश्च महारथाः ।। ८ ।। राधानन्दन! पाण्डव छलपूर्वक हराये गये हैं। महान् वनमें रहकर उन्हें बड़ा कष्ट भोगना पड़ा है। वे निरन्तर तपस्या करते रहे हैं और अब विशेष शक्तिसम्पन्न हो गये हैं। महारथी तो वे हैं ही ।। ८ ।।

धर्मराजो न संक्रुद्ध्येद् भीमसेनस्त्वमर्षणः । यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एव तु केवलम् ।। ९ ।। माना कि धर्मराज युधिष्ठिर क्रोध नहीं करेंगे, परंतु भीमसेन तो सदा ही अमर्षमें भरे रहते हैं और राजा द्रुपदकी पुत्री कृष्णा भी साक्षात् अग्निकी ही मूर्ति है ।। ९ ।।

यूयं चाप्यपराध्येयुर्दर्पमोहसमन्विताः । ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विताः ।। १० ।। तुमलोग तो अहंकार और मोहमें चूर रहते ही हो; अतः उनका अपराध अवश्य करोगे। उस दशामें वे तुम्हें भस्म किये बिना नहीं छोड़ेंगे; क्योंकि उनमें तपःशक्ति विद्यमान है ।। १० ।।

अथवा सायुधा वीरा मन्युनाभिपरिप्लुताः । सहिता बद्धनिस्त्रिंशा दहेयुः शस्त्रतेजसा ।। ११ ।। अथवा, उन वीरोंके पास अस्त्र-शस्त्रोंकी भी कमी नहीं है। तुम्हारे प्रति उनका क्रोध सदा ही बना रहता है। वे तलवार बाँधे सदा एक साथ रहते हैं; अतः वे अपने शस्त्रोंके तेजसे भी तुम्हें दग्ध कर सकते हैं ।।

अथ यूयं बहुत्वात् तानभियात कथंचन । अनार्यं परमं तत् स्यादशक्यं तच्च वै मतम् ।। १२ ।। यदि संख्यासे अधिक होनेके कारण तुमने ही किसी प्रकार उनपर चढ़ाई कर दी तो यह भी तुम्हारी बड़ी भारी नीचता ही समझी जायगी। मेरी समझमें तो तुमलोगोंका पाण्डवोंपर विजय पाना असम्भव ही है ।। १२ ।।

उषितो हि महाबाहुरिन्द्रलोके धनंजयः । दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ ततः प्रत्यागतो वनम् ।। १३ ।। महाबाहु धनंजय इन्द्रलोकमें रह चुके हैं और वहाँसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा लेकर वनमें लौटे हैं ।। १३ ।।

अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता बीभत्सुना पुरा । किं पुनः स कृतास्त्रोऽद्य न हन्याद् वो महारथः ।। १४ ।।

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