महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1637, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहले जब अर्जुनको दिव्यास्त्र नहीं प्राप्त हुए थे, तभी उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया था। अब तो महारथी अर्जुन दिव्यास्त्रोंके विद्वान् हैं, ऐसी दशामें वे तुम्हें मार डालें, यह कौन बड़ी बात है? ।। १४ ।।
अथवा मद्वचः श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ । उद्विग्नवासो विश्रम्भाद् दुःखं तत्र भविष्यति ।। १५ ।। अथवा मेरी बात सुनकर तुमलोग वहाँ यदि अपनेको काबूमें रखते हुए सावधानीके साथ रह सको, तो भी यह विश्वास करके कि ये लोग सत्यवादी होनेके कारण हमें कष्ट नहीं देंगे, वनवाससे उद्विग्न हुए पाण्डवोंके बीचमें निवास करना तुम्हारे लिये दुःखदायी ही होगा ।। १५ ।।
अथवा सैनिकाः केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरम् । तदबुद्धिकृतं कर्म दोषमुत्पादयेच्च वः ।। १६ ।। अथवा यह भी सम्भव है कि तुमलोगोंके कुछ सैनिक युधिष्ठिरका अपमान कर बैठें और तुम्हारे अनजानमें किया गया यह अपराध तुमलोगोंके लिये हानिकारक हो जाय ।। १६ ।।
तस्माद् गच्छन्तु पुरुषाः स्मारणायाप्तकारिणः । न स्वयं तत्र गमनं रोचये तव भारत ।। १७ ।। अतः भरतनन्दन! दूसरे विश्वसनीय पुरुष गौओंकी गणना करनेके लिये वहाँ चले जायँगे। स्वयं तुम्हारा वहाँ जाना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता ।। १७ ।।
शकुनिरुवाच
धर्मज्ञः पाण्डवो ज्येष्ठः प्रतिज्ञातं च संसदि । तेन द्वादश वर्षाणि वस्तव्यानीति भारत ।। १८ ।। शकुनि बोला— भारत! ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं। उन्होंने भरी सभामें यह प्रतिज्ञा की है कि 'हमें बारह वर्षोंतक वनमें रहना है' ।। १८ ।।
अनुवृत्ताश्च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो न नः कोपं करिष्यति ।। १९ ।। अन्य पाण्डव भी धर्मपर ही चलनेवाले हैं; अतः वे सब-के-सब युधिष्ठिरका ही अनुसरण करते हैं। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर हमलोगोंपर कदापि क्रोध नहीं करेंगे ।।
मृगयां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्तते भृशम् । स्मारणं तु चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ।। २० ।। हमारी विशेष इच्छा केवल हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेकी है। हमलोग वहाँ स्मरणके लिये केवल गौओंकी गणना करना चाहते हैं। पाण्डवोंसे मिलनेकी हमारी इच्छा बिलकुल नहीं है ।। २० ।।