भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1638

न चानार्यसमाचारः कश्चित् तत्र भविष्यति । न च तत्र गमिष्यामो यत्र तेषां प्रतिश्रयः ॥ २१ ॥ हमारी ओरसे वहाँ कोई भी नीचतापूर्ण व्यवहार नहीं होगा। जहाँ पाण्डवोंका निवास होगा, उधर हमलोग जायँगे ही नहीं ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामतः ॥ २२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शकुनिके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने इच्छा न होते हुए भी मन्त्रियों-सहित दुर्योधनको वहाँ जानेकी आज्ञा दे दी ॥ २२ ॥

अनुज्ञातस्तु गान्धारिः कर्णेन सहितस्तदा । निर्ययौ भरतश्रेष्ठो बलेन महता वृतः ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर गान्धारीपुत्र भरतश्रेष्ठ दुर्योधन कर्ण और विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ २३ ॥

दुःशासनेन च तथा सौबलेन च धीमता । संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ॥ २४ ॥ दुःशासन, बुद्धिमान् शकुनि, अन्यान्य भाइयों तथा सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुर्योधनने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ २४ ॥

तं निर्यान्तं महाबाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः । पौराश्चानुययुः सर्वे सहदारा वनं च तत् ॥ २५ ॥ द्वैतवन नामक सरोवर तथा वनको देखनेके लिये यात्रा करनेवाले महाबाहु दुर्योधनके पीछे समस्त पुरवासी भी अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर गये ॥ २५ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागायुतानि च । पत्तयो बहुसाहस्रा हयाश्च नवतिः शताः ॥ २६ ॥ दुर्योधनके साथ आठ हजार रथ, तीस हजार हाथी, कई हजार पैदल और नौ हजार घोड़े गये ॥ २६ ॥

शकटापणवेषाश्च वणिजो वन्दिनस्तथा । नराश्च मृगयाशीलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७ ॥ बोझ ढोनेके लिये सैकड़ों छकड़े, दुकानें तथा वेष-भूषाकी सामग्रियाँ भी साथ चलीं। वणिक्, वंदीजन तथा आखेटप्रिय मनुष्य सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें साथ गये ॥ २७ ॥

ततः प्रयाणे नृपतेः सुमहानभवत् स्वनः । प्रावृषीव महावायोरुद्धतस्य विशाम्पते ॥ २८ ॥