महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1640, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद
वैशम्पायन उवाच
अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन् ।
जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ-तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों (गोशालाओं)-के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली ॥ १ ॥
रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरहे ।
देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथान् पराः ॥ २ ॥
उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये ॥ २ ॥
तथैव तत्समीपस्थान् पृथगावसथान् बहून् ।
कर्णस्य शकुनेश्चैव भ्रातॄणां चैव सर्वशः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार दुर्योधनके डेरेके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक्-पृथक् बहुत-से खेमे पड़ गये ॥ ३ ॥
ददर्श स तदा गावः शतशोऽथ सहस्रशः ।
अङ्कैलैक्षैश्च ताः सर्वा लक्षयामास पार्थिवः ॥ ४ ॥
(रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया। उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी ॥ ४ ॥
अङ्कयामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसृतांस्त्वपि ।
बालवत्साश्च या गावः कालयामास ता अपि ॥ ५ ॥
फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी। जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी ॥ ५ ॥
अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् ।
वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत् कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥
इस प्रकार जाँच-पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक् गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी