भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1641

प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा ॥ ६ ॥ स च पौरजनः सर्वः सैनिकाश्च सहस्रशः । यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन् यथामराः ॥ ७ ॥ वे समस्त पुरवासी और सहस्रोंकी संख्यामें आये हुए सैनिक उस वनमें अपनी-अपनी रुचिके अनुसार देवताओंके समान क्रीड़ा करने लगे ॥ ७ ॥ ततो गोपाः प्रगातारः कुशला नृत्यवादने । धार्तराष्ट्रमुपातिष्ठन् कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ ८ ॥ तदनन्तर नृत्य और वादनकी कलामें कुशल कुछ गवैये गोप तथा गहने-कपड़ोंसे सजी हुई उनकी कन्याएँ दुर्योधनके समीप आयीं ॥ ८ ॥ स स्त्रीगणावृतो राजा प्रहृष्टः प्रददौ वसु । तेभ्यो यथार्हमन्नानि पानानि विविधानि च ॥ ९ ॥ अपनी स्त्रियोंके साथ राजा दुर्योधन उनको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत-सा धन दिया तथा यथायोग्य नाना प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ ९ ॥ ततस्ते सहिताः सर्वे तरक्षून् महिषान् मृगान् । गवयर्क्षवराहांश्च समन्तात् पर्यकालयन् ॥ १० ॥ तदनन्तर वे सब लोग तरक्षुओं (जरखों), जंगली भैंसों, गवयों, रीछों और शूकरों एवं अन्य जंगली हिंसक पशुओंका सब ओरसे शिकार करने लगे ॥ १० ॥ स ताञ्छरैर्विनिर्भिद्य गजांश्च सुबहून् वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान् ॥ ११ ॥ उन्होंने वनके रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से हाथियोंको अपने बाणोंसे विदीर्ण करके अनेकानेक हिंस्र पशुओंको पकड़ लिया ॥ ११ ॥ गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्च भारत । पश्यन् स रमणीयानि वनान्युपवनानि च ॥ १२ ॥ मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैतवननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा ॥ १२-१३ ॥ मत्तभ्रमरसंजुष्टं नीलकण्ठरवाकुलम् । सप्तच्छदसमाकीर्णं पुन्नागबकुलैर्युतम् ॥ १४ ॥