महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1642, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहाँ मधुमत्त भ्रमर कमलपुष्पोंका रस ले रहे थे। मयूरोंकी मधुर वाणीसे वह सारा प्रदेश व्याप्त हो रहा था। सप्तच्छद (छितवन)-के वृक्षोंसे वह सरोवर आच्छादित-सा जान पड़ता था। उसके तटोंपर मौलसिरी और नागकेसरके वृक्ष शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥
ऋद्ध्या परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम ॥ १६ ॥ (विद्वद्भिः सहितो धीमान् ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ।) कृत्वा निवेशमभितः सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान् धर्मपत्न्या नराधिपः ॥ १७ ॥ उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी विद्वान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे ॥ १५—१७ ॥
ततो दुर्योधनः प्रेष्यानादिदेश सहस्रशः । आक्रीडावसथाः क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत ॥ १८ ॥ भारत! तदनन्तर दुर्योधनने अपने सहस्रों सेवकोंको आज्ञा दी—'तुमलोग बहुत-से क्रीडामण्डप तैयार करो' ॥
ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिणः । चिकीर्षन्तस्तदाऽऽक्रीडाञ्जग्मुर्द्वैतवनं सरः ॥ १९ ॥ आज्ञाकारी सेवक दुर्योधनसे 'तथास्तु' कहकर क्रीडाभवन बनानेकी इच्छासे द्वैतवनके सरोवरके निकट गये ॥ १९ ॥
प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वाः समवारयन् । सेनाग्रयं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सरः ॥ २० ॥ दुर्योधनका सेनानायक द्वैतवन सरोवरके अत्यन्त निकटतक पहुँच गया था, उस वनके द्वारपर पैर रखते ही उसको गन्धर्वोंने रोक दिया ॥ २० ॥
तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते । कुबेरभवनाद् राजन्नाजगाम गणावृतः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ गन्धर्वराज चित्रसेन पहलेसे ही अपने सेवकगणोंके साथ कुबेरभवनसे आये हुए थे ॥ २१ ॥
गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथाऽऽत्मजैः । विहारशीलः क्रीडार्थं तेन तत् संवृतं सरः ॥ २२ ॥