महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1643, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे उन दिनों अप्सराओं तथा देवकुमारोंके साथ विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण करते थे। उन्होंने स्वयं ही क्रीड़ाविहारके लिये उस सरोवरको सब ओरसे घेर लिया था॥ २२॥ तेन तत् संवृतं दृष्ट्वा ते राजपरिचारकाः। प्रतिजग्मुस्ततो राजन् यत्र दुर्योधनो नृपः॥ २३॥ स तु तेषां वचः श्रुत्वा सैनिकान् युद्धदुर्मदान्। प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति॥ २४॥ राजन्! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि ‘गन्धर्वोंको वहाँसे मार भगाओ’॥ २३-२४॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञः सेनाग्रयायिनः। सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्॥ २५॥ राजाका यह आदेश सुनकर उसकी सेनाके नायक द्वैतवन सरोवरके समीप जाकर गन्धर्वोंसे इस प्रकार बोले—॥ २५॥ राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली। विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत॥ २६॥ ‘गन्धर्वो! महाराज धृतराष्ट्रके बलवान् पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ विहार करनेकी इच्छासे पधार रहे हैं। तुमलोग उनके लिये यह स्थान खाली करके दूर चले जाओ’॥ २६॥ एवमुक्तास्तु गन्धर्वाः प्रहसन्तो विशाम्पते। प्रत्यब्रुवंस्तान् पुरुषानिदं हि परुषं वचः॥ २७॥ राजन्! उनके ऐसा कहनेपर गन्धर्व जोर-जोरसे हँसने लगे; और उन राजसेवकोंको उत्तर देते हुए उनसे इस प्रकार कठोर वाणीमें बोले—॥ २७॥ न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धिः सुयोधनः। योऽस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकसः॥ २८॥ ‘तुम्हारा राजा दुर्योधन मूर्ख है। उसे तनिक भी चेत नहीं है; क्योंकि वह हम देवलोकवासी गन्धर्वको भी बनियोंके समान समझकर इस प्रकार आज्ञा दे रहा है॥ यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशयः। ये तस्य वचनादेवमस्मान् ब्रूत विचेतसः॥ २९॥ ‘तुमलोगोंकी भी बुद्धि मारी गयी है। इसमें संदेह नहीं कि तुम सब-के-सब मरना चाहते हो। तभी तो उस दुर्योधनके कहनेसे तुम इस प्रकार हमसे विचारहीन होकर बातें कर रहे हो॥ २९॥ गच्छध्वं त्वरिताः सर्वे यत्र राजा स कौरवः। न चेदद्यैव गच्छध्वं धर्मराजनिवेशनम्॥ ३०॥