भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1644

'या तो तुम सब लोग तुरन्त वहीं लौट जाओ, जहाँ तुम्हारा राजा दुर्योधन रहता है। या यदि ऐसा नहीं करना है, तो अभी धर्मराजके नगर (यमलोक) की राह लो' ॥ ३० ॥ एवमुक्तास्तु गन्धर्वै राज्ञः सेनाग्रयायिनः ।
सम्प्राद्रवन् यतो राजा धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ॥ ३१ ॥
गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर राजाके सेनानायक योद्धा वहीं भाग गये, जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्वयं विराजमान था ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे
चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादविषयक दो सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३१ १/३ श्लोक हैं)