महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1657, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुःशासनं दुर्विषहं दुर्मुखं दुर्जयं तथा ।। बद्ध्वा हरन्ति गन्धर्वा अस्मदारांश्च सर्वशः । अनुधावत मां क्षिप्रं रक्षध्वं पुरुषोत्तमाः ।। वृकोदर महाबाहो धनंजय महायशः । यमौ मामनुधावेतां रक्षार्थं मम सायुधौ ।। कुरुवंशस्य तु महदयशः प्राप्तमीदृशम् । व्यपोहयध्वं गन्धर्वाञ्जित्वा वीर्येण पाण्डवाः ।।
दुर्योधन बोला—पूरुवंशका यश बढ़ानेवाले समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी पुरुषसिंह महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मुझे गन्धर्व बलपूर्वक हरकर लिये जा रहा है। मेरी रक्षा करो। महाबाहो! यह शत्रु तुम्हारे भाई मुझ दुर्योधनको बाँधे लिये जाता है। साथ ही ये सारे गन्धर्व दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुर्जय तथा हमारी रानियोंको भी बंदी बनाकर लिये जा रहे हैं। पुरुषोत्तम पाण्डवो! शीघ्र इनका पीछा करो और मेरे प्राण बचाओ। महाबाहु वृकोदर और महायशस्वी धनंजय! मेरी रक्षा करो। दोनों भाई नकुल और सहदेव भी अस्त्र-शस्त्र लिये मेरी रक्षाके लिये दौड़े आवें। पाण्डवो! कुरुवंशके लिये यह बड़ा भारी अयश प्राप्त हो रहा है। तुम अपने पराक्रमसे इन गन्धर्वोंको जीतकर मार भगाओ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं विलपमानस्य कौरवस्यार्तया गिरा । श्रुत्वा विलापं सम्भ्रान्तो घृणयाभिपरिप्लुतः ।। युधिष्ठिरः पुनर्वाक्यं भीमसेनमाब्रवीत् ।)
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार आर्त वाणीमें विलाप करते हुए दुर्योधनका करुण क्रन्दन सुनकर माननीय युधिष्ठिर दयासे द्रवित हो गये। उन्होंने पुनः भीमसेनसे कहा— ।।
क इहार्यो भवेत् त्राणमभिधावेति नोदितः । प्राञ्जलिं शरणापन्नं दृष्ट्वा शत्रुमपि ध्रुवम् ।। १२ ।।
‘इस जगत्में कौन ऐसा श्रेष्ठ पुरुष है, जो हाथ जोड़कर शरणमें आये हुए शत्रुको भी देखकर और उसके द्वारा की हुई ‘दौड़ो-बचाओ’ की पुकार सुनकर उसकी रक्षाके लिये दौड़ नहीं पड़ेगा? ।। १२ ।।
वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च पाण्डवाः । शत्रोश्च मोक्षणं क्लेशात् त्रीणि चैकं च तत्समम् ।। १३ ।।
‘पाण्डवो! वरदान, राज्यप्रदान, पुत्रकी प्राप्ति कराना तथा शत्रु्का संकटसे उद्धार करना—इन चार वस्तुओंमेंसे प्रारम्भके तीन और अन्तका एक समान हैं ।। १३ ।।
किं चाप्यधिकमेतस्माद् यदापन्नः सुयोधनः ।