भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1658

त्वद्बाहुबलमाश्रित्य जीवितं परिमार्गते ॥ १४ ॥ 'तुम्हारे लिये इससे बढ़कर आनन्दकी बात और क्या होगी कि दुर्योधन विपत्तिमें पड़कर तुम्हारे बाहुबलके भरोसे अपने जीवनकी रक्षा करना चाहता है? ॥ १४ ॥

स्वयमेव प्रधावेयं यदि न स्याद् वृकोदर । विततो मे क्रतुर्वीर न हि मेऽत्र विचारणा ॥ १५ ॥ 'वीर भीमसेन! यदि मेरा यह यज्ञ प्रारम्भ न हो गया होता तो मैं स्वयं ही दुर्योधनको छुड़ानेके लिये दौड़ा जाता। इस विषयमें मेरे लिये कोई दूसरा विचार करना उचित नहीं है ॥ १५ ॥

साम्नैव तु यथा भीम मोक्षयेथाः सुयोधनम् । तथा सर्वैरुपायैस्त्वं यतेथाः कुरुनन्दन ॥ १६ ॥ 'कुरुनन्दन भीम! शान्तिपूर्ण ढंगसे समझा-बुझाकर जिस तरह भी दुर्योधनको छुड़ा सको, सभी उपायोंसे वैसा ही प्रयत्न करना ॥ १६ ॥

न साम्ना प्रतिपद्येत यदि गन्धर्वराडसौ । पराक्रमेण मृदुना मोक्षयेथाः सुयोधनम् ॥ १७ ॥ 'यदि समझाने-बुझानेसे वह गन्धर्वराज चित्रसेन तुम्हारी बात न माने तो कोमलतापूर्ण पराक्रमके द्वारा दुर्योधनको छुड़ानेकी चेष्टा करना ॥ १७ ॥

अथासौ मृदुयुद्धेन न मुञ्चेद् भीम कौरवान् । सर्वोपायैर्विमोच्यास्ते निगृह्य परिपन्थिनः ॥ १८ ॥ 'भीम! यदि कोमलतापूर्ण युद्धसे भी वह कौरवोंको न छोड़े तो तुम सभी उपायोंसे उन लुटेरे गन्धर्वोंको कैद करके कौरवोंको छुड़ाना ॥ १८ ॥

एतावद्धि मया शक्यं संदेष्टुं वै वृकोदर । वैताने कर्मणि तते वर्तमाने च भारत ॥ १९ ॥ 'भरतनन्दन वृकोदर! इस समय मेरा यह यज्ञकर्म चालू है; अतः ऐसी स्थितिमें मैं तुम्हें इतना ही संदेश दे सकता हूँ' ॥ १९ ॥

वैशम्पायन उवाच

अजातशत्रोर्वचनं तच्छ्रुत्वा तु धनंजयः । प्रतिजज्ञे गुरोर्वाक्यं कौरवाणां विमोक्षणम् ॥ २० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अजातशत्रु युधिष्ठिरका उपर्युक्त वचन सुनकर अर्जुनने अपने बड़े भाईकी आज्ञाके अनुसार कौरवोंको छुड़ानेकी प्रतिज्ञा की ॥ २० ॥