महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुन उवाच
यदि साम्ना न मोक्ष्यन्ति गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् । अद्य गन्धर्वराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ।। २१ ।।
**अर्जुन बोले—**यदि गन्धर्वलोग समझाने-बुझानेसे कौरवोंको नहीं छोड़ेंगे, तो यह पृथ्वी आज गन्धर्वराजका रक्त पीयेगी ।। २१ ।।
अर्जुनस्य तु तां श्रुत्वा प्रतिज्ञां सत्यवादिनः । कौरवाणां तदा राजन् पुनः प्रत्यागतं मनः ।। २२ ।।
राजन्! सत्यवादी अर्जुनकी वह प्रतिज्ञा सुनकर कौरवोंके जीमें जी आया ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोचनानुज्ञायां त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनको छुड़ानेकी आज्ञाविषयक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३७ १/३ श्लोक हैं)