भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1667, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1667

गन्धर्वोंके मस्तक, बाहु तथा पैर कट-कटकर इस प्रकार गिरने लगे मानो पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो। इससे शत्रुओंको बड़ा भय होने लगा ॥ १४ ॥ ते वध्यमाना गन्धर्वाः पाण्डवेन महात्मना । भूमिष्ठमन्तरिक्षस्थाः शरवर्षैरवाकिरन् ॥ १५ ॥ महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर आकाशमें स्थित हुए गन्धर्वोंने पृथ्वीपर खड़े हुए अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की ॥ १५ ॥ तेषां तु शरवर्षाणि सव्यसाची परंतपः । अस्त्रैः संवार्य तेजस्वी गन्धर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥ तेजस्वी परंतप सव्यसाचीने अपने अस्त्रोंद्वारा गन्धर्वोंकी बाणवर्षाका निवारण करके उन्हें फिरसे घायल कर दिया ॥ १६ ॥ स्थूणाकर्णेन्द्रजालं च सौरं चापि तथार्जुनः । आग्नेयं चापि सौम्यं च ससर्ज कुरुनन्दनः ॥ १७ ॥ कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले अर्जुनने स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल, सौर, आग्नेय तथा सौम्य नामक दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया ॥ १७ ॥ ते दह्यमाना गन्धर्वाः कुन्तीपुत्रस्य सायकैः । दैतेया इव शक्रेण विषादमगमन् परम् ॥ १८ ॥ कुन्तीकुमारके उन सायकोंसे गन्धर्व उसी प्रकार दग्ध होने लगे, जैसे इन्द्रके बाणोंद्वारा दैत्य। इससे उनको बड़ा विषाद हुआ ॥ १८ ॥ ऊर्ध्वमाक्रममाणाश्च शरजालेन वारिताः । विसर्पमाणा भल्लैश्च वार्यन्ते सव्यसाचिना ॥ १९ ॥ जब वे ऊपरकी ओर उड़ने लगते तब अर्जुनके बाणोंके जालसे उनकी गति रुक जाती थी, और जब इधर-उधर भागने लगते तब सव्यसाची अर्जुनके भल्ल नामक बाण उन्हें आगे बढ़नेसे रोकते थे ॥ १९ ॥ गन्धर्वांस्त्रासितान् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रेण भारत । चित्रसेनो गदां गृह्य सव्यसाचिनमाद्रवत् ॥ २० ॥ भारत! इस प्रकार कुन्तीकुमारके द्वारा गन्धर्वोंको त्रस्त हुआ देख गन्धर्वराज चित्रसेनने गदा लेकर सव्यसाची अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २० ॥ तस्याभिपततस्तूर्णं गदाहस्तस्य संयुगे । गदां सर्वायसीं पार्थः शरैश्चिच्छेद सप्तधा ॥ २१ ॥ हाथमें गदा लिये बड़े वेगसे युद्धके लिये आते हुए चित्रसेनकी उस गदाके, जो सब-की-सब लोहेकी बनी हुई थी, अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा सात टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥ स गदां बहुधा दृष्ट्वा कृत्तां बाणैस्तरस्विना । संवृत्य विद्ययाऽऽत्मानं योधयामास पाण्डवम् ॥ २२ ॥