भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1672, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1672

प्रिय सखा तथा शिष्य हैं' ।। वचनाद् देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् ।। ७ ।। अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम् । नेष्याम्येनं दुरात्मानं पाकशासनशासनात् ।। ८ ।। वहाँसे देवराजकी यह आज्ञा मानकर मैं तुरन्त यहाँ चला आया। यह दुरात्मा दुर्योधन मेरी कैदमें आ गया है; अतः अब मैं देवलोकको जाऊँगा और पाकशासन इन्द्रकी आज्ञासे इस दुरात्माको भी वहीं ले जाऊँगा ।। ८ ।।

अर्जुन उवाच

उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्रातास्माकं सुयोधनः । धर्मराजस्य संदेशान्मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ९ ।। **अर्जुन बोले—**चित्रसेन! दुर्योधन हमलोगोंका भाई है। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराजके आदेशसे इसे छोड़ दो ।। ९ ।।

चित्रसेन उवाच

पापोऽयं नित्यसंतुष्टो न विमोक्षणमर्हति । प्रलब्धा धर्मराजस्य कृष्णायाश्च धनंजय ।। १० ।। **चित्रसेनने कहा—**धनंजय! यह पापी सदा राज्यसुख भोगनेके कारण हर्षसे मतवाला हो उठा है; अतः इसे छोड़ना उचित नहीं है। इसने धर्मराज युधिष्ठिर तथा द्रौपदीको धोखा दिया है ।। १० ।। नेदं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ।। ११ ।। कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर इसके इस कुटिल अभिप्रायको नहीं जानते हैं; अतः यह सब सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ।। ११ ।।

वैशम्पायन उवाच

ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् । अभिगम्य च तत् सर्वं शशंसुस्तस्य चेष्टितम् ।। १२ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सब लोग राजा युधिष्ठिरके पास गये। वहाँ जाकर गन्धर्वोने दुर्योधनकी सारी कुचेष्टा कह सुनायी ।। १२ ।। अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा । मोक्षयामास तान् सर्वान् गन्धर्वान् प्रशशंस च ।। १३ ।। गन्धर्वोंका यह कथन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिरने उस समय समस्त कौरवोंको बन्धनसे छुड़ा दिया और गन्धर्वोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की— ।। १३ ।।